ज्ञान पुराने के बल पर नए को पाने की यात्रा कथा है
इंसान ने प्रकृति से बहुत ही अधिक संघर्ष और सहयोग दोनों कर आज ये मुकाम हासिल किया है। विषमतम परिस्थितियों में जंगलों और गुफाओं से निकल कर हमारे पूर्वजों ने हमें ये मकाम दिया है। आग, सुई, लकड़ी और हड्डी के हथियारों को खोजते, बनाते, इतिहास के कई मुकामों को पार करते हुए इंसान आज यँहा पहुँचा है। सोचने, समझने, अनुभव करने और याद रखने की क्षमता, लिखने और बोलने की कला और सामूहिकता तथा सहकारिता की स्वाभाविक आदतों के बल पर इंसान ने ज्ञान का अकूत भंडार जमा किया है। हर पीढ़ी द्वारा अर्जित ज्ञान को संचित कर गुफाओं से निकल कर अंतरिक्ष तक का, आग से बढ़कर परमाणु ऊर्जा का सफर तय किया है। कभी रोगों को आसमानी आफत समझ कर काँपने वाला इंसान आज हज़ारों लाखों रोगों पर जीत हासिल कर चुका है। और ये सब इंसान कर पाया है अर्जित ज्ञान को संचित कर।
हर पीढ़ी में अर्जित ज्ञान उस पीढ़ी का सच रहा है। आज जिस अतीत के ज्ञान को हम वर्तमान के ज्ञान के बल पर गलत भी ठहरा पाते हैं तो सिर्फ इसलिए कि अतीत में हमने वो ज्ञान जो अर्जित किया था, वही हमारे आगे बढ़ने की सीढ़ी बना था। हो सकता है कि आगे आने वाली पीढ़ियाँ हमारे वर्तमान ज्ञान के बहुतेरे या कुछेक भाग को गलत साबित कर दें लेकिन यही ज्ञान तो आगे का रास्ता खोलता है। ज्ञान "सही-गलत-सही" की यात्रा है। इसके आलोक में जब इंसान चिकित्सा विज्ञान की खोज कर रहा था तो डर से आगे बढ़कर जादू-टोना, झाड़-फूँक, फिर कुछ कुछ प्रमाण आधारित चिकित्सा पद्धतियाँ, फिर विस्तृत और फिर और विस्तृत और फिर अति सूक्ष्म नहीं दिख पाने वाली पद्धतियों को विकसित करता चला गया। हर पीढ़ी , हर युग का अपना चिकित्सा विज्ञान रहा और आगे भी रहेगा। इसमें देसी-विदेसी जैसा कुछ नहीं है। हम हिंदुस्तान में जिस देसी चिकित्सा पद्धति यानी आयुर्वेदिक, यूनानी आदि की बात करते हैं वो हमारी सभ्यता के तात्कालिक चरण के विकास यात्रा के अनुसार सही रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे अन्य सभ्यताओं में भी रहे हैं। विकास की यात्रा में इन पद्धतियों के कुछ तथ्य विकसित हो पाए, कुछ नहीं। तब आगे की चिकित्सा पद्धति ने जन्म लिया। ये पद्धति भी अंतिम नहीं है, बल्कि इंसान और विकसित होकर इससे भी आगे जाएगा ये भी तय है, जैसे पहले से होता आया है। सिर्फ पुरातन से जुड़े रहकर आधुनिकता का विरोध करना मनुष्य के विकसित हो सकने की अद्भुत क्षमता का अपमान नहीं है तो क्या है। पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ सकने की इंसानी ताकत भर भरोसा कर विज्ञान परक दृष्टि न रखकर जो कौम सिर्फ और सिर्फ पुरातन से चिपकी रहेगी वो कभी आगे नहीं बढ़ पाएगी। आप खुद अपनी आँखों से देखें कि दुनिया की कौन सी सभ्यताएँ आगे बढ़ रहीं हैं और कौन पीछे जा रहीं हैं और इनके कारण क्या हैं। किसी की बात पर भरोसा नहीं कर खुद के इंसांनी विवेक पर भरोसा कर विश्लेषण करें तब खुद ब खुद समझ जायेंगे कि ये सब राजीतिक चोंचले भर हैं , इनका कोई सम्बन्ध ज्ञान -विज्ञान से कदापि नहीं है।