3.आत्मविजय अभियान-तीसरी कड़ी-बुरे गुण खुद भयभीत होते हैं और खुद को भी भयभीत करते हैं
सच तो ये है कि जब आपमें बुराई भरी हुई रहती है तो उस बुराई से आप ताकतवर नहीं बनते। बुराई की संख्या चाहे जितनी बड़ी हो वो अच्छाई के सामने छोटी ही होती है और चाहे उस बुराई को जिस संज्ञा या विशेषण से सजा दें उसके अंदर अच्छाई से एक डर बैठा ही रहता है सो वो अपने दूसरे सहयोगियों से वाचाल होकर अपने भय को दबाना चाहता है।
यँहा ये समझने की बात ये है कि हम चाहे जिस स्थिति में हों अपने अंदर बुराइयों को, उन दुर्गुणों को आने से रोकना चाहिए जिससे हमारे अंदर बुरी प्रवृत्तियों घर कर सकती हो। हमको अच्छी प्रवृतियों पर ध्यान लगाकर उनको अपनाना चाहिए अन्यथा हम सारा जीवन एक अदृश्य डर के साये में बिताएंगे और बार बार अपने मन के भय का प्रदर्शन भी करते रहेंगे। और हम ये बक बक उनके सामने भी करते रहेंगे जिन्हें हमारी अच्छाई और बुराई दोनों के बारे में पता है।
लेकिन मोह की एक खासियत भी होती है। मोह से बुराई बढ़ती है तो मोह ही जिज्ञासा भी उत्पन्न करता है।यही जिज्ञासा हमें बुराई की तरफ भी ले जाती है और अच्छाई की तरफ भी। और हम एक ऐसे व्यक्ति की खोज करते हैं जो हमारी जिज्ञासा को शांत कर सके। अब हमारा दायित्व है कि हम अपने मोह का इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति को खोजने के लिए करें जो हमारे अंदर की अच्छी प्रवृत्तियों को उभार सके। अगर ऐसा गुरु मिल भी जाये तो हमें चाहिए कि उस गुरु से हम उस ज्ञान को लें जिससे हमें अपनी अच्छाई को बढाने की क्षमता मिले। अन्यथा मोहवश हम हमेशा भय के साये में जीने के लिए अभिशप्त रहेंगे।
महाभारत के युद्ध के प्रारम्भ में ही दुर्योधन गुरु द्रोण से कहता है कि पांडवों की व्यूहकार भारी सेना जिसमे अर्जुन और भीम सरीखे महारथी हैं, उन्हें देखिए, तो साफ साफ परिलक्षित होता है कि भले उसकी अपनी सेना बहुत विशाल है लेकिन उसके मन में पांडव सेना का और अर्जुन और भीम सरीखे योद्धाओं का डर बैठा हुआ है। ये तब है जब उसकी सेना पांडव सेना से लगभग डेढ़ गुनी बड़ी है। जब हमारे अंदर बुरी प्रवृत्तियाँ मजबूत होती हैं तो भी की यही छटपटाहट हमारे अंदर घर किये रहती हैं। सो हमें अपनी बुरी प्रवृत्तियों और उनसे मिली भ्रममयी शक्तियों से निजात पाना चाहिए। ध्यान रहे बुराई ताकत से ताकत नहीं आती, बल्कि बुराई से, दुर्गुणों से भय ही आता है। आप अपने अगल बगल देखिए, जो जितना बड़ा अपराधी है उसे उतनी अधिक सुरक्षा चाहिए होती है। लेकिन जिसे दुर्गुणो पर नहीं अच्छे गुणों का भरोसा है वह अधिक निश्चिंत होता है। ये हमारे वश में है कि हम दुर्गुणों से भरा डर का जीवन जीना चाहते हैं या अच्छे सद्गुणों से संचालित निश्चिंत मन का जीवन।