10. आत्मविजय अभियान पाठ 10 पहले भ्रम को मारें तभी अच्छाई उभरेगी
महाभारत के युद्ध के लिए पांडव और कौरव सेना युद्ध के मैदान में एक दूसरे के सामने अपनी अपनी व्यूह रचना के साथ आमने सामने खड़ी हो हो चुकी है।अर्जुन श्रीकृष्ण को रख को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलने को कहते हैं ताकि वे दोनों सेनाओं का युद्ध के पूर्व निरीक्षण कर सकें। देखिए श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को कँहा ले आकर खड़ा करते हैं। दोनों पक्षों के बीच ठीक भीष्म और द्रोण के समक्ष। यदि कृष्ण चाहते तो रथ दुर्योधन के सम्मुख भी खड़ा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे सीधे भीष्म और द्रोण के सामने अर्जुन को ले आये। यदि सामने दुर्योधन रहता तो कदाचित गीता वाचन का अवसर भी नहीं आता और सीधे युद्ध प्रारम्भ हो जाता। दुर्योधन और अर्जुन दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति घोर वैर था। दुर्योधन ही वह प्रमुख कारक था जिसके कारण पांडवों को इतने कष्ट उठाने पड़े थे। लेकिन तब जो युद्ध होता उसमें धर्म का कोई स्थान नहीं होता। वह युद्ध दुर्योधन के लालच रूपी अधर्म और अर्जुन के बदले की भावना रूपी अधर्म के बीच होता जिसमें मूल्यों का कोई स्थान नहीं होता। तब बुराई से अच्छाई नहीं लड़ रही होती बल्कि एक बुराई दूसरे बुराई से लड़ रही होती। इसके परिणाम स्वरूप बुराई ही अंत परिणाम के रूप में सामने आती। हम एक कि बुराई को दूसरे की बुराई से नहीं हरा सकते, क्योंकि कोई भी बुराई का परिणाम अच्छाई नहीं होती। तब एक कि बुराई दूसरे की बुराई से बस स्थान्तरित हो जाती है। एक अधर्म का स्थान दूसरा अधर्म ले लेता है। लालच और बदले की भावना में क्या हो जाता यदि एक का लालच हार ही जाता तो। बस यही होता कि बदले की भावना जीत कर प्रतिशोध का साम्राज्य कायम कर देती। तब वैमस्य का कँहा अंत होता। तब ये युद्ध धर्म युद्ध होता ही नहीं। हमें कभी भी एक बुराई को हराने के लिए दूसरे बुराई का सहारा नहीं लेना चाहिए।
सो कृष्ण अर्जुन को भीष्म और द्रोण के समक्ष ले जाते हैं। यँहा दोनों के बीच कोई वैमस्य नहीं है। यँहा एक सम्भावना है कि अर्जुन को अपने आदरणीय अंग्रजो को देख कर अपनी करुण भावनाओं , अपने मोह से संघर्ष करना पड़े। जब हमारे स्वजन, हमारे आदरणीय गलती करते हैं तो हम मोह वश उनकी गलतियों से आँख मोड़ना चाहते हैं। लेकिन ऐसा कर हम बुराइयों को प्रश्रय ही देते हैं। एक प्रकार से अधर्म के बढ़ोतरी में सहायक ही होते हैं। सो जब हमारे अंदर अच्छाई और बुराई का संघर्ष हो तो हमारी समझ इतनी होनी चाहिए कि हम बुराई का साथ न दें। यही बात हमारे कार्यक्षेत्र में भी लागू होती है। जो गलत के रास्ते पर है या जो अधर्म के रास्ते पर है, भले ऐसा करने वाला हमारा कितना भी प्यारा क्यों न हो, भले हमारा अपना ही अंग क्यों न हो, हमें अपनी मानसिक अवस्था इतनी मजबूत रखनी चाहिए की हम उसके बुराइयों का प्रतिवाद और प्रतिकार कर सकें।
भीष्म भ्रम और द्रोण गुरु होने के नाते द्वैत के प्रतीक हैं। अच्छे और बुरे के संघर्ष में अच्छाई का पहला सामना भ्रम से होता है। यह भ्रम अच्छाई को अपने मोह पाश में लेकर उसकी मति मारना चाहता है। तरह तरह के तर्क देता है, भय, लालच, अहंकार, असत्य , हिंसा इत्यादि को जन्म देता है। दूसरी तरफ गुरु हमें इस बात का भान दिलाता है कि यदि हमें जीत हासिल करनी है तो हमें सन्मार्ग पर बढ़ने का रास्ता चुनना होगा। जब भी हम बड़ी चुनौतियों से दो चार होते हैं तो सबसे पहले हमें अपने भ्रम को मारना होता है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। अच्छाई के प्रति, सही के प्रति हमारी प्रतिबद्धता अटूट होनी चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को एक मौका देते है कि भीष्म यानी भ्रम के बहाने अर्जुन मोह से दूर होकर सत्य के प्रति प्रतिबद्ध हो सके। अर्जुन का रथ भीष , द्रोण और समस्त राजाओं के मध्य खड़ा है। हमारे सामने अभी अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ खड़ी हैं । जरूरी है कि हम अपनी प्रतिबद्धता अच्छाई के प्रति साबित कर सकें। हर बड़ी चुनौती सामने आने पर हम सभी के सामने ऐसी हो परिस्थिति रहती है। यदि हम सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमारी मानसिक स्थिति भ्रम को काटने वाली होंनी ही चाहिए। किंकर्तव्यविमूढ़ता को हराये बिना हमारी नजर साफ ही नही हो पाती। श्रीकृष्ण अर्जुन को अच्छाई और बुराई के इस महाभारत में बुराई से लड़ने के लिए उसे गुणों से तैयार करना चाहते हैं। हमें बुराई को हराने के लिए, अनीति को हराने के लिए सिर्फ शरीर से ही नहीं विवेक से भी मजबूत होना होता है और ये तभी होता है जब हम बुराई के मकड़जाल से सीधे सीधे उलझ कर बाहर आते हैं।