8. आत्मविजय अभियान-पाठ आठ --आकलन की आवश्यकता
कोई भी समझदार व्यक्ति जब किसी समस्या का हल करना चाहेगा, अथवा जब भी किसी परिस्थिति से मुकाबला करना चाहेगा तो सबसे पहले क्या करेगा? सबसे पहले वह समस्या के हर पहलू को परखेगा, हर पहलू की ताकत और कमजोरी का आकलन कर लेना चाहेगा। उसी के बाद अपनी रणनीति तय करेगा। बिना समस्या को समझे सीधे जाकर सिर भिड़ा देना निरी मूर्खता के अतिरिक्त कुछ और नहीं होता। बड़ी से बड़ी समस्या और बड़े से बड़े ताकतवर का कोई कमजोर पक्ष भी होता है, जिससे निपट कर इंसान उस बड़ी से बड़ी समस्या या बड़े से बड़े ताकतवर आदमी को हरा सकता है, हरा भी देता है।
अपने विरोधी के संगी साथियों की भी पहचान कर लेना जरूरी होता है ताकि ये पता रहे कि आपके वैरी कौन और किस तरह के लोग हैं। इसी प्रकार जब आप कोई बड़ी समस्या सुलझाने चलते हैं तो आपको मालूम होना चाहिए कि किस किस तरह की अन्य समस्याएँ आपके रास्ते आ सकती हैं। तो ये है कि यदि आप सही में प्रयास करना चाहते हैं तो आपकी रणनीति में ये बातें शामिल होनी ही चाहिए। और ये बात जीवन के हर पहलू पर लागू होती हैं।
और ये भी सच है कि जब आपकी ही बुराई, आपके ही दुर्गुण, आपको घेरने लगे तो सावधानी पूर्वक आपको पहचान करनी होती है कि वो कौन से दुर्गुण हैं जो आपको घेर रहें हैं। तभी आप उनसे छुटकारा पाने का , उनसे पार पाने का रास्ता भी निकालेंगे। दवा करने के पहले मरीज के हर मर्ज की जाँच करना जरूरी है। ध्यान रखना चाहिए कि दुर्गुण हमेशा झुण्ड में आपको घेरते हैं , वो अकेले अकेले कभी नहीं आते।
महाभारत की कथा में श्रीमद्भागवद्गीता के प्रथम श्लोक के बीसवें इक्कीसवें श्लोक में अर्जुन के लिए कपिध्वज शब्द और कृष्ण के लिए अच्युत सम्बोधन का इस्तेमाल किया गया है। युद्ध की कथा के अनुसार हनुमान जी अर्जुन के रथ पर रहते हैं। हनुमान सम्पूर्ण कथा संसार में सबसे बुद्धिमान और शक्तिशाली किरदार माने गए हैं। साथ ही सबसे शीलवान भी। मतलब साफ है कि जब आप बड़ी समस्याओं से निपटने चलते हैं तो आपका शरीर स्वास्थ्य रहे, आपकी बुद्धि उत्कृष्ट स्तर की हो और चरित्र साफ सुथरा हो। इन तीन महत्वपूर्ण कारकों के अभाव में आपके प्रयास विफल हो जाएंगे। ये तीनों आपको अपराजेय शक्ति देते हैं।
इसीप्रकार हम देखते हैं कि कृष्ण के लिए अच्युत सम्बोधन का प्रयोग हुआ है और ये प्रयोग अर्जुन के द्वारा किया गया है। रथी अपने सारथी को अच्युत कह रहा है अर्थात जिसका पतन नहीं हो सकता हो। श्रीकृष्ण अर्जुन के फ्रेंड, फिलॉस्फर और गाइड की भूमिका में हैं और अर्जुन को उनपर इतना भरोसा है कि वो मानता है कि श्रीकृष्ण का पतन नहीं हो सकता अर्थात श्रीकृष्ण उसे कभी गलत सलाह नही दे सकते। जीवन में। हम सभी को ऐसे ही मित्र होने चाहिए जो हर परिस्थिति में हमें सही सलाह दे सकें और जिनपर हमें भरोसा भी हो और जिनके प्रति हमारे मन में सम्मान भी हो। कठिन समय में इस तरह के मित्र की जरूरत ज्यादा होती है। बुरे व्यक्ति के मित्र भी बुरे ही होते हैं जबकि अच्छे व्यक्ति के मित्र अच्छे होते हैं।
सो समस्या के निपटारे के लिए हमें क्या करना चाहिए इसे सारांश में हम यूँ समझ सकते हैं:
1.समस्या का वस्तुनिष्ठ और सापेक्षिक आकलन अनिवार्य है ताकि हमें समस्या की ताकत, क्षमताओं और कमियों की सम्यक जानकारी करनी चाहिए। और ऐसा हम समस्या के आँख में आँख डालकर ही कर सकते हैं, नजर चुरा कर नहीं।
2. हमारी संवेदनाओं पर बुद्धि का और उसपर विवेक का नियंत्रण भी अवश्य होनी चाहिए ताकि हम सही और संतुलित निर्णय ले सकें।
3. हमारा चरित्र साफ सुथरा होना चाहिए ताकि समस्या हमारे किसी कमजोर नजर नब्ज को नही पकड़ पाए अर्थात हमको अपनी कमजोरियों को दूर करने आना चाहिए।
3.हमारे अंदर धीरज का प्रवाह होना चाहिए ताकि हम नाप तौल कर अगला कदम उठा सकें।
4.शरीर स्वस्थ होना चाहिए और मन, बुद्धि और शारीरिक क्षमता उत्तम होना चाहिए ताकि बिना घबराहट के हम निर्णय लेने में सक्षम हो सकें।