4.आत्मविजय अभियान-चौथी कड़ी-छोटी अच्छाई भी बड़ी बुराइयों से बड़ी होती है।
दुर्योधन जब कहता है कि पांडवों की व्यूहकार भारी सेना में अर्जुन और भीम सरीखे महारथी हैं, तो साफ साफ परिलक्षित होता है कि भले उसकी अपनी सेना बहुत विशाल है लेकिन उसके मन में पांडव सेना का और अर्जुन और भीम सरीखे योद्धाओं का डर बैठा हुआ है। ये तब है जब उसकी सेना पांडव सेना से लगभग डेढ़ गुनी बड़ी है।
सच तो ये है कि जब आपमें बुराई भरी हुई रहती है तो उस बुराई से आप ताकतवर नहीं बनते। बुराई की संख्या चाहे जितनी बड़ी हो वो अच्छाई के सामने छोटी ही होती है और चाहे उस बुराई को जिस संज्ञा या विशेषण से सजा दें उसके अंदर अच्छाई से एक डर बैठा ही रहता है सो वो अपने दूसरे सहयोगियों से वाचाल होकर अपने भय को दबाना चाहता है।
यँहा ये समझने की बात ये है कि हम चाहे जिस स्थिति में हों अपने अंदर बुराइयों को, उन दुर्गुणों को आने से रोकना चाहिए जिससे हमारे अंदर बुरी प्रवृत्तियों घर कर सकती हो। हमको अच्छी प्रवृतियों पर ध्यान लगाकर उनको अपनाना चाहिए अन्यथा हम सारा जीवन एक अदृश्य डर के साये में बिताएंगे और बार बार अपने मन के भय का प्रदर्शन भी करते रहेंगे। और हम ये बक बक उनके सामने भी करते रहेंगे जिन्हें हमारी अच्छाई और बुराई दोनों के बारे में पता है।
लेकिन मोह की एक खासियत भी होती है। मोह से बुराई बढ़ती है तो मोह ही जिज्ञासा भी उत्पन्न करता है।यही जिज्ञासा हमें बुराई की तरफ भी ले जाती है और अच्छाई की तरफ भी। और हम एक ऐसे व्यक्ति की खोज करते हैं जो हमारी जिज्ञासा को शांत कर सके। अब हमारा दायित्व है कि हम अपने मोह का इस्तेमाल ऐसे व्यक्ति को खोजने के लिए करें जो हमारे अंदर की अच्छी प्रवृत्तियों को उभार सके। अगर ऐसा गुरु मिल भी जाये तो हमें चाहिए कि उस गुरु से हम उस ज्ञान को लें जिससे हमें अपनी अच्छाई को बढाने की क्षमता मिले। अन्यथा मोहवश हम हमेशा भय के साये में जीने के लिए अभिशप्त रहेंगे।