1 आत्मविजय अभियान-पहली कड़ी- सत्य क्यों?
श्रीमद्भागवद्गीता के प्रारम्भ ही में युद्ध को लेकर धृतराष्ट्र की उत्सुकता झलकी है । उसे पता होता है कि उसने और उसके पुत्रों ने पांडवो के साथ ढेरों छल किये हैं। इसलिए उसके अंदर एक छटपटाहट भी है। वो बेचैन है, सो सवाल करता है। जब आप गलती किये होते हैं और पीड़ित आपके सामने सीना तानकर आपसे दो दो हाथ करने आ जाता है तो आप नैतिक रूप से कमजोर हो जाते हैं । उस वक़्त आपके अंदर ये जानने की बेचैनी स्वाभाविक रूप से होती है कि जो पीड़ित है वो किस तरह से प्रतिकार करता है। हर चोर की दाढ़ी में तिनका तो होता ही है, वो बात बात पर चिहुँकता जरूर है। यही हाल धृतराष्ट्र का है।
धृतराष्ट्र जन्मान्ध है। आँखें देखने के काम आती हैं। लेकिन जिसके आँखों पर पर्दा हो वो खुद क्या देखेगा। यही हाल धृतराष्ट्र का भी है। उसे पुत्रमोह है। उस मोह में उसे भला बुरा कुछ नहीं दिखता, वो तो बस मोह में फँसा अपराध ही करते आया है। सच यही है। जिसके आँख पर मोह की पट्टी हो वो सही गलत नहीं समझ पाता है। लेकिन जब उसे लगता है कि उसके अपराधों का फैसला होने वाला है उस वक़्त उसके दिल की धड़कन बढ़ जाती है, वो बार बार उत्सुक होकर लोगों से परिणाम के बारे में पूछता ही है। लेकिन सवाल उठता है कि उसे सही बात बताये तो कौन बताए। सच वही बोल सकता है जिसमें सच बर्दाश्त करने का सयम हो, संजय इसी सयम का प्रतीक है। वो सारथी है सो सवारी की फिक्र करना उसका फर्ज भी है।
अब देखिए, युद्ध तो कुरुक्षेत्र में हो रहा है तो फिर धृतराष्ट्र कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यों कहता है? दरअसल जो इंसान पूरी जिंदगी कुकर्म ही करते रहता है उसे भी अंत समय ये भान तो होता ही है कि उसका फैसला तो धर्म के अनुसार ही होगा। बड़ा से बड़ा चोर अपने मन में ये तो समझता ही है कि उसका अंतिम फैसला धर्म के अनुसार ही होगा और उसे दण्ड ही मिलेगा।
दरअसल हर इंसान के अंदर अच्छाई और बुराई दोनो ही होते हैं । जब बुराई जोर मारती है तो वो कौरव हो जाता है, और जब अच्छाई भारी पड़ती है तो पांडव। हर घड़ी हम सब के अंदर हमारी ही अच्छाई हमारी बुराई से लड़ रही होती है और यही महाभारत है। लेकिन जब तक हमारे आँख पर मोह की पट्टी बंधी है तब तक हम खुद इस लड़ाई को देखने समझने में असमर्थ होते हैं। तब समझने के लिए हम सारथी का सहारा लेते हैं अर्थात उस इंसान का सहारा लेते हैं जो हमें सत्य बता सके। आप गौर करें कि गीता में पहली बेचैनी धृतराष्ट्र ने दिखाई है और सत्य जानने के लिए उस इंसान का सहारा लिया है जो हमेशा उसे सही रास्तों पर रथ में घुमाया है। उसे स्वाभाविक रूप से संजय पर भरोसा है जो उसे हमेशा रास्तों के कठिनाई से बचा कर यात्रा कराते रहा है। इसीप्रकार गीता में दूसरी बेचैनी अर्जुन की दिखती है और वो भी सत्य के लिए अपने सारथी यानी श्रीकृष्ण की शरण में ही जाता है। बढ़िया सारथी वही है जो मार्ग में आपसे सच बोले भले वो अप्रियकर ही क्यों न हो और जो अपको गन्तव्य तक पहुँचा सके। हम सभी भी तो यही करते हैं, भ्रम होने पर उन्ही से सलाह लेते हैं जो जीवन में हमें सही मार्ग बताते आये हैं। मुजरिम जेल से बचने के लिए जेलर को नहीं खोजता वो तो वकील को खोजता है।
सच तो यही है कि जीवन भर उल्टा सीधा काम करने वाला, हमेशा गलत का साथ देने वाला अंधा ही होता है लेकिन फैसले की घड़ी में घबड़ा कर उसके पास दौड़ता है जिसपर उसे भरोसा है कि वो उसे सत्य का रास्ता सुझाएगा। और जीवन में लड़ाई का मैदान हमेशा हमारे अंदर होता है। बाहर वही कुछ हमपर प्रभाव डालता है जो हमारे अंदर होता है। सो कुरुक्षेत्र तो हमारा अपना ही शरीर है जिसमें स्थूल काया के साथ साथ हमारी इन्द्रियाँ हैं, मन है, बुद्धि है, चित्त है, हमारे विकार हैं । जब इनसे पार पाना होता है तो हम अपनी अच्छाई को आगे बढ़ाते हैं। उस समय हमारी ही बुराई हमारी अच्छाई पर हमला कर हमारे महाभारत को जन्म देती है। और इस दौरान हमारे अवगुण हमें विचलित करते रहते हैं, हम बार बार घबरा कर उस इंसान से जिसपर हमें भरोसा हो कि वो सत्य कहेगा उससे अपनी ही लड़ाई का परिणाम पूछते हैं।
सो सच को समझने के लिए , उसे जानने के लिए हमें भ्रम और मोह से निकलना चाहिए। भ्रम और मोह हमें सत्य से मिलने नहीं देते। सत्य सामने ही होता है, प्रत्यक्ष होता है किंतु उसे देखने, समझने के लिए दूसरों के मदद की आवश्यकता पड़ जाती है। लेकिन दूसरों की बात पर भी हम कब भरोसा कर किसी कथ्य को सच मानते हैं? हम उसी पर भरोसा कर पाते हैं जो हमारे गलत और सही दोनों तरह के कर्मों का न सिर्फ साक्षी रहा हो, बल्कि हमें हमेशा सही रास्ते पर ले चला हो।
जरूरत है आज कि हम खुद के अंदर की बेचैनी को समझ सकें, ईमानदारी और सच्चाई के साथ स्वीकार कर सकें। संजय ने तो सत्य ही बताया लेकिन क्या अंत में धृतराष्ट्र की बेचैनी दूर हुई? नहीं हुई। जो श्रीकृष्ण ने समझाया उसे अर्जुन , संजय और धृतराष्ट्र तीनों ने सुना। अर्जुन समझ गया, संजय भी समझ गया लेकिन धृतराष्ट्र नहीं समझ पाया। दरअसल हमारे जीवन में अगर सबसे अधिक किसी चीज का हस्तक्षेप होता है तो वह है मोह और मोह जनित भ्रम। उसे हटाना निश्चय ही मुश्किल है, लेकिन असम्भव नहीं। अंत में अर्जुन अपने मोह से मुक्ति पा ली, लेकिन उसी ज्ञान को सुनने के बावजूद धृतराष्ट्र जँहा था वंही रहा, उसने मोह में आकर युद्ध को होने दिया। यही तो हम सब भी करते रहते हैं। जीवन में गलत करते रहेंगे, जब उलझेंगे तो किसी के पास मदद हेतु दौड़ेंगे, वह हमारी मदद भी करेगा लेकिन हम फिर अपने पुराने रास्ते लौट आएंगे।
अगर हम इस तथ्य और सत्य को समझें तो हम न सिर्फ अपने जीवन के सत्यों को स्वीकार कर पाएंगे, बल्कि समाज के स्तर पर फैले अनाचार और हिंसा की निरर्थकता को भी समझ कर उनके विरुद्ध खड़े हो पाएंगे।
सो सत्य के साथ आएँ, बात बनाने और आपको भ्रम और मोह में उलझाए रखने वालों साथ जाएँ।
अगर हम ऐसा कर सके तो इस धरती को एक बेहतर जगह बना पाने में सफल हो पाएंगे।