7.आत्मविजय अभियान -पाठ 7-विवेक जागृत कर अच्छाइयों को आगे लाएं
जब अधर्म क्रियाशील हो ही जाता है, जब वो आपकी अच्छाइयों को मिटाना चाहता है तब एक ही रास्ता बचता है और वो है अधर्म को समूल नष्ट करना। यही से युद्ध के प्रारम्भ का उद्घोष होता है।
महाभारत के युद्ध के प्राम्भ में , जब अभी युद्ध प्राम्भ नहीं हुआ है बल्कि होने वाला है भीष्म के सिंहनाद और शंख बजाने से कौरव पक्ष में उत्साह का संचार होता है, अधर्मी, अविवेकी, हिंसक, असत्य की रक्षा करने , माया मोह और अतृप्त रहने वाली इक्षाओं को संवारने वाली शक्तियाँ इकट्ठी होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में जरूरी है कि इन आसुरी प्रवृत्तियों(दुर्गुणों) का नाश करने के लिए दैवी प्रवृत्तियाँ आगे आएं और इनका नाश करें।
अब ध्यान दें। आसुरी प्रवृत्तियाँ यानी दुर्गुणों को कौन नेतृत्व दे रहा है? भीष्म--यानी भ्रम, जिसे इक्षामृत्यु का वरदान है अर्थात अनंत इक्षाएँ जो भ्रम वश आपको आपके दुर्गुणों से बाँधती है वहीं आपके दुगुणों की नेता होती हैं।
अब देखिए जब सद्गुण यानी दैवी गुण यानी सत्य, अहिंसा, विवेक, इत्यादि को पांडवों के पक्ष को कौन नियंत्रित कर रहा है? पहला शंख श्रीकृष्ण बजाते हैं। महाभारत के युद्ध में कृष्ण सारथी की भूमिका में हैं। सारथी आपके रथ को आपके गंतव्य तक ले जाने वाला होता है। वो आपके रथ, आपके घोड़ों, घोड़ों के लगाम को नियंत्रित कर आपको सही पथ पर से ले जाकर आपको गन्तव्य तक पहुंचाता है।
ये एक ऐसा अंतर है जिसको समझना बहुत ही जरूरी है। तभी आप अपनी वृत्तियों को अपने विवेक के नियंत्रण में रख सकते हैं।
शरीर रथ है, इन्द्रियाँ इस शरीर को चलाने वाले घोड़े हैं लगाम मन है और मन को नियंत्रित करने वाला सारथी आपका विवेक है, इन्द्रियों के अंग आपके रास्ते हैं और आत्मा रथी है।
विवेक से नियंत्रित मन इन्द्रियों को बहकने नहीं देता बल्कि उनको उनके प्रमाद के विषय से हटाकर सद्पथ पर ले जाता है। मन की भावनाएँ भ्रम से नियंत्रित हो ही नहीं सकती। भ्रम से तो क्रोध, वासना, ईक्षा , हिंसा आदि ही होंगे। विवेक हमारी प्रवृत्तियाँ को अच्छाई के रास्ते ले जाता है। कृष्ण इन्ही प्रवृत्तियों को सही रास्ते को दिखाने के लिए आगे बढ़कर नेतृत्व देते हैं।
जब आपके अंदर दैवी गुण जग जाते हैं तब वे संगठित हो कर आपके अंदर की बुराइयों का प्रतिकार करने के लिए पूरे उत्साह से एकत्रित हो जाते हैं। यही कारण है कि श्रीकृष्ण के शंखनाद करते ही अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, सात्यकि, द्रुपद, शिखण्डी, धृष्टधूम्न, द्रौपदीपुत्र और सुभद्रापुत्र सभी शंखनाद करते हैं। विवेक के नेतृत्व में, विवेक के आह्वान पर हमारे अंदर की अच्छाई जाग उठती है, उनमें उत्साह भर जाता है और वे बुराइयों के खात्मे के लिए तैयार हो जाती हैं।
हम ये भी देखते हैं कि संजय ने अर्जुन के रथ की भव्यता, और महत्वपूर्ण वीरों के शंखों के नाम भी बताए हैं।
संजय ने विभिन्न विरो के शंखों के नाम भी कहे हैं जो निम्न प्रकार से हैं
कृष्ण-पाञ्चजन्य
अर्जुन-देवदत्त
भीम-पौंड्र
युधिष्ठिर--अनंतविजय
नकुल---सुघोष
सहदेव---मनीपुष्प
जब दैवी गुण संगठित होकर बुराइयों का सामना करने के लिए एकजुट हो जाते है तो बुराइयों के अंदर भय का संचार हो जाता है। यही कारण है कि पांडव पक्ष का शंखनाद जिससे धरती और आसमना भी गुंजायमान हो उठे कौरव पक्ष में डर भर गया।
महाभारत के युद्ध के इस इस विवरण के पीछे संजय की दो मंशा साफ है। एक तो हम सभी के अंदर अच्छी चीजों की प्रसंसा करने की ललक होती है। हम ऐसी चीजों को जो अच्छी होती हैं उनके बारे में खूब अच्छी अच्छी बातें करते हैं। संजय भी पांडवों से उनके गुणों के कारण प्रभावित है। सो उनके बारे में विस्तार से बताते हैं। दूसरे की सम्भवतः संजय के मन में अभी भी ये आशा बची है कि शायद पांडवों का वैभव जानकर धृतराष्ट्र शायद अब भी युद्ध रोक दें।
इस विवरण से स्पष्ट है कि जब जब अधर्म, अत्याचार, अनाचार बढ़े और समझाने से भी अधर्मी न समझे और विनाश के लिए तत्पर रहे तब हमें अपनी अच्छाई पर भरोसा कर पूरे उत्साह से और अपने विवेक के नियंत्रण में रहकर उसका नाश करने के लिए आगे आना चाहिए। यही वो घड़ी है जब युद्ध प्रारम्भ होने वाला होता है। उस समय आपके सद्गुण इकट्ठा होकर विवेक के नेतृत्व में आपके दुर्गुणों का प्रतिकार करने के लिए खड़े हो जाते हैं। विवेक सद्गुणों में उत्साह का संचार करता है जिससे मनुष्य की अच्छाइयाँ खुलकर बिना किसी डर के आगे आती हैं।