11.आत्मविजय अभियान पाठ 11-हमारा निर्देशन कौन करता है
महाभारत के यश में श्रीकृष्ण कई बार अर्जुन के लिए पार्थ सम्बोधन का उपयोग करते हैं। अर्जुन की माँ कुंती का एक नाम पृथा भी है, अर्जुन को उसके माँ के नाम से जोड़कर श्रीकृष्ण सम्बोधित करते हैं। यानी माँ कुंती के सारे गुण अर्जुन में भी हैं ये इस तथ्य का प्रतीक है।
पृथा पार्थिव का भी द्योतक है यानी जो मिट्टी का बना है अर्थात जो नाशवान है। मतलब जब जब हम अपने इस मिट्टी के नाशवान शरीर को ही बुराई से लड़ने का साधन बना लेते हैं तब हम पार्थ हैं। हमारा शरीर ही वो रथ है जिसपर सवार होकर हम सन्मार्ग पर चलते हैं।
अब देखें, अर्जुन को ये प्रेरणा कौन दे रहा है। ये प्रेरणा कृष्ण यानी हृषिकेश दे रहे हैं यानी जो इन्द्रियों के स्वामी दे रहें हैं। महाभारत की कथा में श्रीकृष्ण के लिए कई बार हृषिकेश का सम्बोधन किया गया है। मतलब की हमारी प्रेरणा का मूल स्रोत हमारा विवेक ही है। यही बतलताता है कि हमे क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है।
महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन के निर्देश पर उनके सारथी बने श्रीकृष्ण रथ को पांडव और कौरव सेना के मध्य खड़ा कर के पार्थ यानी अर्जुन को कहते हैं कि युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख पार्थ। यानी अर्जुन को देखने का निर्देश श्रीकृष्ण दे रहें हैं। हमने पूर्व में देखा है कि कौरव पक्ष में ये निर्देश दुर्योधन देता है। वह अहंकार और बेचैनी में गुरु द्रोण को पांडवों की सेना के वीरों को देखने के लिए कहता है। लेकिन इसके विपरीत यँहा हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण जो इन्द्रियों के स्वामी हृषिकेश हैं, विवेकी हैं वो अर्जुन को कह रहे है समस्त कुरुओं यानी कौरव और पांडव दोनो को देखने के लिए कहते हैं।
कौरव और पांडव दोनों कुरुवंशी ही हैं। श्री कृष्ण दुर्योधन की तरह योद्धा विशेष का नाम नहीं गिनाते। विवेक स्वाभाविक रुप से इंसान को यही समझाता है कि कोई भी कार्य करने के पूर्व उससे जुड़ी अच्छाई और बुराई, उससे जुड़े सद्गुण और दुर्गुण, उससे जुड़े सही और गलत दोनों को देखे। यदि हम कुछ करने जा रहें हैं तो हमें ठहर कर हर पक्ष का ठीक से अवलोकन कर लेना चाहिए। अन्यथा हम सही और गलत का निर्णय नहीं कर सकते और ऐसी स्थिति में सफलता के लिए कुछ भी गलत सही करने के लिए तैयार तैयार हो जाएंगे जिसके कारण बहुत ही विनाशकारी परिणाम भी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण का निर्देश विवेक का निर्देश ही तो है। हमारे कर्म कैसे होंगे ये इस पर निर्भर करता है कि हमने अपने को निर्देशित करने के लिए किसे चुना है। यदि हम दुर्गुणों को अपना निर्देशन सौंपते हैं , यदि इंद्रियों को आजादी देते हैं तो हम गलत कर्म करेंगे हीं करेंगे। यदि विवेक का निर्देशक के रूप में चयन करते हैं तो फिर हमारे कर्म हमारी इंद्रियों से संचालित न होकर हमारे विवेक से संचालित होते हैं और ऐसे कर्म अच्छे हीं होंगे, ये भी तय है। हम अच्छा कर्म कर रहें हैं कि बुरा कर्म, ये किसी अन्य पर नहीं निर्भर होता है। बल्कि यह निर्भर होता है कि हम अपनी मर्जी से अपना बागडौर अपनी इंद्रियों को सौपते हैं या अपने विवेक को।