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हम दुखी क्यों हो जाते हैं?

हम दुखी क्यों हो जाते हैं?

हम जीवन में बहुत सारी घट चुकी घटनाओं, घट रही घटनाओं और घटित होने वाली घटनाओं की आशंका से खुश और दुख अनुभव कर कर के तनाव लेते रहते हैं। संसार की समस्त घटनाओं को कई अलग अलग तरह से समझा जा सकता है। अपने जीवन में घट रही विभिन्न घटनाओं को समझने का एक तरीका ये होता है कि हम उनको दो वृहत श्रेणियों में बाँट देते हैं, सृजन और विनाश और जिनपर विलाप करते हैं उनको विनाश की श्रेणी में  रखते हैं और जिनपर प्रसन्नता अनुभव करते हैं उनको सृजन  की श्रेणी में रखते हैं।  
        इस तथ्य को समझने के लिए हम महाभारत  के युद्ध का प्रसंग ले सकते हैं। युद्ध के मैदान में जब कौरव और पांडव पक्षों की सेनाएं आमने सामने आती हैं तो अर्जुन जो अबतक अपने जीवन सभी युद्धों में विजयी रहा है अचानक युद्ध का विरोधी हो जाता है जिसपर श्रीकृष्ण उसे झिड़की भी देते हैं। अब सवाल उठता है कि श्रीकृष्ण ऐसा क्यों कह रहें हैं। अर्जुन तो युद्ध का, मार काट का विरोध ही न कर रहा है, वह तो युद्ध के पश्चात समाज में फैलने वाली परिस्थिति  की ही न बात कर रहा है, वो यही न कह रहा है कि भीष्म और द्रोण जैसे महात्मनों को मारना उचित नहीं है । अब भला शांति चाहने और शांति का तर्क देने वाला अर्जुन गलत कैसे हो गया? इस तथ्य को समझना अति आवश्यक है क्योंकि इसे समझे बिना हम अपने विषादों का हल नहीं पा सकते हैं।
     हम चीजों को , घटनाओं को वैसे ही देखते हैं जैसे हम खुद को समझते रहें हैं। हमारी खुद के प्रति समझ के तीन भाग होते हैं, शारीरिक, भावनात्मक और विवेकात्मक। हम खुद को तीन तरह से देखते हैं, एक अपने शरीर की तरह, एक अपनी भावना की तरह और एक अपनी बुद्धि, अपने विवेक की तरह और अपने इसी समझ के अनुसार हम सब अलग अलग तरीके से चींजों को देखते हैं। किसी की मृत्यु से कोई दुखी होता है तो किसी को खुशी होती है, किसी की सफलता से कोई खुश होता है तो किसी की आँखों में वो सफलता गड़ती है। कोई प्रश्न किसी के लिए असाध्य होता है तो किसी के लिए वही प्रश्न खिलौना की तरह होता है। तो क्या उस घटना का , उस वस्तु का अपना कोई स्वरूप नहीं होता कि उसका अस्तित्व हमारी अपनी समझ से निर्धारित होता है? ऐसे में एक सवाल तो उठता ही है कि क्या कोई स्थायी स्वरूप नहीं होता जो हर परिस्थिति में समान रहे?       इस प्रश्न का उत्तर तो है लेकिन उस उत्तर तक पहुँचने के पूर्व ये जरूरी है कि हम पहले खुद को तो जाने कि हम कौन हैं। क्या हम नित्य बदलने वाले जीव मात्र हैं जिसकी अपनी समझ कोई नहीं होती बल्कि परिस्थिति जन्य ही हमारा अस्तित्व है? ये समझना इसलिए भी अनिवार्य है क्योंकि निरन्तर बदलते शारीरिक , भावनात्मक और बौद्धिक अवस्था से क्या सत्य निर्धारित हो सकता है। 
    श्रीकृष्ण इसी शाश्वत की समझ रखते हैं सो उनको अर्जुन का यह व्यवहार सत्य के विपरीत लगता है। अभी तक तो अर्जुन युद्ध के लिए तैयार था तो फिर अचानक भीष्म और द्रोण को देखते यह ज्ञान कँहा से आ टपका? क्या अर्जुन को युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व युद्ध की विभीषिका की जानकारी नहीं थी? क्या युद्ध उसके लिए कोई नई चीज थी? ऐसे ही तमाम सवाल हम अर्जुन को लेकर उठा सकते हैं।  तो फिर ये असमंजस क्यों?
      हम सभी अपने जीवन के अलग अलग प्रसंगों में इसी असमंजस में जीने के आदि हो गए हैं जिसके कारण हम अधिकांश समय तनाव और विषाद में ही बिताते हैं फिर चाहे हम घर में हों, विद्यालय में हों, दोस्तों के साथ हों , नौकरी व्यवसाय में हों या नितांत अकेले ही क्यों न हों। यदि हम आप अपने एक दिन की मानसिक अवस्था का टाइम चार्ट बनाएं तो पाएंगे कि हमारा अधिकांश वक़्त तनाव और चिंता में ही बीतता है । ऐसा नहीं कि जिनके पास कम ज्ञान है, कम साधन है सिर्फ उनकी ही स्थिति ऐसी रहती हो। जिनके पास प्रचुरता है वो भी तो ऐसी ही अवस्था में रहते हैं। सो तय है कि हमारे तनाव और विषाद का कारण बाहर की दुनिया में कम और अपने भीतर की दुनिया में अधिक होता है। संसाधन की आवश्यकता तो है लेकिन संसाधन ही हमारी संतुष्टि और प्रसन्नता का निर्धारक हो ये कतई जरूरी नहीं। होता यह है कि हम अपना अधिकांश समय बाहरी कारकों के प्रति प्रतिक्रिया को जीने में गुजरते हैं बिना ये जाने बुझे कि हम वास्तव में कौन हैं और बिना ये समझे कि बाहरी कारक हमपर उतना ही प्रभाव छोड़ सकते हैं जितना हम खुद को समझते हैं। दुनिया के आर्थिक विकास और संसाधनों के सबसे ऊँचे पायदान पर खड़े देशों, समाजों के लोग जरूरी नहीं कि सबसे खुशहाल जीवन जी रहें हों। हाल में विकसित किया गया हैप्पीनेस इंडेक्स इसकी तकसीद भी करता है। सो सबसे जरूरी है कि सबसे पहले हम ये समझें कि हम वास्तव में कौन हैं, हमारी क्रियाएँ क्या हैं? श्रीकृष्ण इसी सत्य की तरफ इशारा कर रहें हैं ।

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