नीति निर्माताओं के साथ एक इन्हेरेंट दिक्कत ये है कि वे इंसान को आँकड़े से ज्यादा कुछ नहीं मानते हैं और गरीबी एक रेखा भर है जिसे लाँघा तो अमीर हो गए। इस एप्रोच से यकीन मानिये कि विकास कभी नहीं होने वाला है। क्या आपको लगता है कि एक रेखा भर पार कर लेने से आदमी अपने परिवार को एक अच्छी और उपयोगी शिक्षा, ढंग की स्वास्थ्य सेवा, पोषण, साफ सुथरा घर , ठीक ठाक कपड़ा और जीने लायक जिंदगी देने में सक्षम हो जाता है? आदमी को आँकड़े के आईने से देखना बन्द कीजिये और एक न्याय परक, सम्मानजनक जिंदगी सभी को मुहैय्या कराने वाली नीतियों की तरफ लौटिए। नहीं तो एक अमीर पर कई हज़ार/लाख दरिद्र की गिनती करते रह जायेइगा। अभी भी इकोनॉमिक्स को फिलोसॉफी की जररूरत बनी हुई है।