मोक्ष क्या है और क्यों आवश्यक है
जब इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति और भौतिक चीजों को महसूस करने और उस अनुभव को अपने मस्तिष्क की अनुभूतियों द्वारा व्यख्या की जाती है तब हमें सुख या दुख का अनुभव होता है। इन्द्रियों को हम प्रकृति से जितना विलग करेंगे इस सुख दुख की अनुभूति से हम उतना ही दूर होंगे क्योंकि इन्द्रियाँ यानी सेंसेस ही सुख और दुख जैसी भावनाओं की उत्पादक और वाहक हैं। लेकिन ये अचानक नहीं हो सकता। इसके लिए सतत अभ्यास की जरूरत होती है। इन्द्रियों को उनके विषयों से समेटने का अभ्यास तब तक करना होता है जब तक इन्द्रियाँ बाह्य प्रकृति से स्वतंत्र न हो जाएं। जब तक ये अभ्यास पूरा नहीं होता तब तक पूरी सावधानी जरूरी है। साथ ही परिवर्तन के अपरिवर्तनिय सिद्धांत को याद रखना अनिवार्य है। याद रखना होता है कि हर वो चीज जो प्रकृति से निकलती है, हर वो चीज जो भौतिक है वो सतत परिवर्तनीय है । वो बिना परिवर्तित हुए नहीं रह सकता। और ये परिवर्तन अंततः स्वरूप परिवर्तन का कारण बनता है। ये सब इतना स्वाभाविक होता है कि इसपर हर्ष या विषाद करने का कोई कारण नहीं । जिसे बदलना है उसे बदलना ही है।
अब देखें कि इस स्थिति को जो इंसान हासिल करता है क्या वो पत्थर की तरह होता है। जी नहीं। अगर वो इंसान पत्थर की तरह हो गया तो फिर उसे ये भी नहीं पता चल सकता कि उसकी वास्तविक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। वस्तुतः ऐसा इंसान धैर्यवान होता है। दरअसल वो जानता है कि उसे करना क्या है। उसे पता होता है कि उसे परिवर्तन को स्वाभाविक रूप में लेना है और अपनी इन्द्रियों यानी अपने सेन्स को प्रकृति से किस तरह विलग रखना है।
जब हम अभ्यास कर इस परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को आत्मसात कर लेते हैं तब हमारी इन्द्रियाँ वाह्य संसार से मुक्त हो जाती हैं, बाहरी प्रकृति से प्रभावित होकर न तो सुख दे सकती हैं न ही कोई दुख। यही वो अवस्था होती है जब इंसान प्रकृति से मुक्त हो जाता है। वो अपने जीवन काल में ही प्रकृति से मुक्त हो सकता है। प्रकृति से उसकी यही मुक्ति उसका मोक्ष कहलाता है। ऐसा इंसान वाह्य संसार से अपने को नहीं निर्धारित करता। इस स्थिति में उसका ईगो जो उसके शरीर, उसके इन्द्रियों/भावना और उसकी बौद्धिकता से बने होते हैं तिरोहित हो जाते हैं, उसका अहम और वहम दोनों समाप्त हो जाता और तब उसे मोक्ष यानी मुक्ति मिलती है।
जब आप नितांत अकेले होते हैं, समाज में होते हैं, व्यवसाय में होते हैं, या किसी भी अन्य अवस्था में होते हैं अपनी इन्द्रियों के प्रकृति के संयोग के कारण हमें बराबर सुख और दुख मिलते रहते हैं, जिस कारण से हम हम अतिरिक्त तनाव या अत्यधिक लापरवाह और दम्भ की अवस्था में रहते हैं। इससे हमारा जीवन निरुउद्देश्य हो जाता है। हमें पहुँचना होता है कँही और पहुँच जाते हैं कंहीं। रास्ते से भटकना सिर्फ इसिलए हो पाता है क्योंकि हम सब वाह्य प्रकृति को खोज कर उसी के साथ हम अपने ईगो को जोड़ लेते हैं।
इससे मुक्ति ही मोक्ष है। निष्काम कर्म का आधार ही संयोग का अभाव होना है और जब हम संयोग के अभाव की भावना को पा लेते हैं तो मोक्ष की अवस्था में होते हैं। मोक्ष शब्द लोगों को भारी भरकम प्रतीत होता है और लगता है कि यह तो जीवन की समाप्ति के पश्चात मिलता है। मोक्ष कोई मिलने वाली वस्तु नहीं होती है बल्कि ये जीवन जीने की एक अवस्था है जिसमें इंसान मोह को त्याग कर अपने दायित्वों को पूरा करने का अभ्यस्त हो चुका होता है।