Skip to main content

14.आत्मविजय अभियान-पाठ 14-परिवर्तन पर हर्ष क्यों, विषाद क्यों??

    14.आत्मविजय अभियान-पाठ 14-    परिवर्तन पर हर्ष क्यों, विषाद क्यों??

परिवर्तन संसार का नियम है। इस संसार में जो भी भौतिक है वह समय के साथ परिवर्तनशील है। इसका अनुभव हमें हमारी इन्द्रियाँ यानी हमारे सेंस कराते हैं। रूप, स्वर, गंध, स्वाद और स्पर्श हमारी इन्द्रियों से व्यक्त होती है जो क्रमिक रूप से आँख, कान, नाक जिह्वा और त्वचा से महसूस की जाती हैं। हमारी इन्द्रियाँ भौतिक वस्तुओं को इन इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करती हैं। तब मस्तिष्क इन अनुभवों की व्याख्या करता है और हम किसी भौतिक वस्तु के प्रति अपनी भावना व्यक्त करते हैं, जैसे यह सुंदर है, दूर है, उसकी आवाज कर्कश है, इसका स्वाद मीठा है, वह गर्म है इत्यादि। इन्द्रियाँ भौतिक तत्व को उसके गुण के अनुसार महसूस तो कर लेती हैं लेकिन प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक अवस्था अपने अनुसार इस अनुभव को व्यक्त करता है। जैसे कोई वस्तु देखने में किसी को सुंदर लगती है तो किसी को सामान्य, कोई तीखापन को बर्दाश्त भी नहीं कर पाता तो किसी के लिए यही स्वादिष्ट होता है, किसी का स्पर्श हमें आनंद देता है तो उसी का स्पर्श अन्य के मन में दूसरे तरह की भावना को जगाता है। इन्द्रियों ने तो सभी में एक ही भाव पाया किन्तु हमारी भावना की अभिव्यक्ति अलग अलग हो जाती है। 
   इसी प्रकार समय  के साथ इन्द्रियों से प्राप्त भाव भी भिन्न भिन्न हो जाते हैं। जो आज हमें प्रिय है हो सकता है कल अप्रिय हो जाये, जो अभी प्रिय है वह अगले कुछ समय में अप्रिय हो सकता है। इसका उल्टा भी हो सकता है। जिस बच्चे के प्रति माँ की ममता सम्भाले नहीं संभलती वही बच्चा बड़ा होकर माँ के लिए दुखदाई भी हो सकता है।आज हमें चाय का स्वाद अच्छा नहीं लगता, कल चाय अच्छी लगने लग सकती है। इनसब में कुछ भी अनहोनी नहीं है।
        इस प्रकार समय के साथ साथ हर भौतिक अभिव्यक्ति , हर प्राक्रतिक वस्तु में परिवर्तन अवश्यम्भावी है।कुछ परिवर्तन हठात होते हैं, कुछ क्रमिक। परन्तु बिना परिवर्तन के प्रकृति हो ही नहीं सकती। जीव जन्म लेता है, समय बीतने के साथ साथ उसमें परिवर्तन आता है, बड़ा होता है , बूढा होता है, फिर अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है। जैसे जन्म होना हुआ, उसी तरह से मृत्यु होना। मृत्यु भी मात्र एक परिवर्तन ही है। भौतिक रूप से सचेष्ट भौतिक रूप से निश्चेष्ट हो जाता है जैसे अन्य भौतिक या प्राकृतिक स्वरूपों के साथ होता ही है।
      जब परिवर्तन इतना व्यापक और अवश्यम्भावी है तो फिर परिवर्तन आने पर हर्ष या विषाद क्यों होना? ये तो होना ही है। एकदम स्वाभाविक बात है।
   अब प्रश्न उठता है कि जब  परिवर्तन इतना ही निश्चित है तो ये हर्ष और विषाद क्यों परिवर्तन होने पर? दरअसल हमारी सोच इन्द्रियों की अनुभूतियों की हमारी व्यख्या पर निर्भर होती है, तभी हमें परिवर्तन पर हर्ष या विषाद होता है। किसी घटना को हम अपने से जुड़ा मान लेते हैं जबकि उस घटना का स्वतंत्र अस्तित्व होता है, जैसे किसी का मरना। कोई व्यक्ति जिसके प्रति हम कोई भावना नहीं रखते उसे भी प्रकृति के परिवर्तन के नियम के अधीन मरना ही है। लेकिन उसकी मृत्यु से हम पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन यदि उस व्यक्ति को हम खुद से जुड़ा मान लें तो उसकी मृत्यु से हमे कष्ट या प्रसन्नता होती है। मृत्यु तो तटस्थ है ,होना ही है। उससे दुखी या सुखी तब ही हुआ जाता है जब लगता है कि मृत व्यक्ति का हमसे कोई सम्बन्ध है। ये सम्बन्ध कोई वस्तुनिष्ठ चीज नहीं बल्कि हमारी अपने और पराये की समझ से उतपन्न भाव मात्र है।हम अपनी समझ , अपने भ्रम , अपने मोह के कारण ही एक तटस्थ और अवश्यम्भावी  परिवर्तन को इतना बड़ा देते हैं कि हमें शोक या हर्ष होने लगता है।
   परिवर्तन की अवश्यम्भावीता सिर्फ मृत्यु को लेकर नहीं है।  सो ये समझना जरूरी है कि हर उस जीव या वस्तु से जिसके प्रति हमारे अंदर भाव होता है उसके लिए भावना होती है। ये कुछ भी हो सकता है, मृत्यु सहित कुछ भी। किसी को धन से, किसी को पद से, किसी को नशे से, किसी को मित्र से, किसी को स्त्री या पुरुष से, किसी को नौकरी से , किसी को देश से, किसी को समाज से, किसी को कर्मकांडों से , किसी को पुस्तक या भवन या वाहन से , तातपर्य कि किसी भी भौतिक स्वरूप से भाव का सम्बंध हो सकता है तब इन्द्रियाँ उस भावयुक्त स्वरूप को जब मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं तो हमारी भावना फूट कर बह निकलती है।
   जब तक हमारा भ्रम जीवित है ये सुख और दुख होंगे ही। सो भ्रम की समाप्ति तक हमें अपने भ्रम के अनुसार अपने शोक और हर्ष को स्वाभाविक गति मानकर इनके प्रति निर्विकार होने की आदत डालनी चाहिए।
    

Popular posts from this blog

SHRIMADBHAGAVAD GEETA CHAPTER 2 SHLOKA 47

गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।  मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो  ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके।        श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।       ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक

श्रीमद्भागवत गीता-प्रवेशिका से सारांश तक-- श्रीमद्भागवत गीता की शुरुआत महाभारत का युद्ध वास्तविक रूप से शूरु होने के ठीक पहले होती है और इसके अंत के साथ युद्ध प्रारम्भ होता है। तो क्या गीता युद्ध को उकसाने वाला ग्रंथ है?      इस प्रश्न का उत्तर द्वितीय अध्याय की शुरुआत में ही मिल जाता है। प्रथम अध्याय के अंत में अर्जुन हथियार डाल देता है, साफ साफ मना कर देता है कि वो अपने अंग्रजो, अनुजों, गुरुओं, बंधुओं से नहीं लड़ेगा।।सनद रहे वो डरा नहीं था, उसे  विषाद  हो गया था, वो डिप्रेशन में चला गया था। उस समय उसे उकसाने का सबसे सरल तरीका क्या  हो सकता था? कृष्ण उसे जुआ यानी चौसर की सभा याद दिलाते, द्रौपदी का वस्त्रहरण याद दिलाते, लाक्षागृह याद दिलाते, वनवास के दिन याद दिलाते। तब ज्यादा सम्भावना थी कि अर्जुन हिंसक हो कर युद्ध के लिए ततपर हो उठता। लेकिन तब अर्जुन हिंसक होता, उसमें और कौरवों में कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे को तैसा होता । लेकिन कृष्ण ने उसे आत्मा की अजरता, कर्तव्यबोध, धर्म, कर्म के विषय में बताया। एक बार भी प्रतिशोध की आग नहीं भड़काई उन्होंने, बल्कि उसे सत...
It's a hard fact that more than common masses it's the elite, which ditches idea of India as enshrined in the Indian National Movement and in  the  Indian  Constitution. Role of the judiciaal elite in this context has been more objectionable considering the weight of onus she has to carry to carry on the democracy.     It's the elite which sets the course of actions in most of the cases. And among all elites judicial elites are of paramount importance. In india it's judicial elite which has been responsible for killing of democratic credentials.     And when elite fails masses step in and then elite becomes useless. Farmers movement is it's example. Success of farmers mov is not less than a revolution.