16.आत्मविजय अभियान-पाठ 16- स्थाई शिक्षा क्या है?
विषाद को और सन्मार्ग की समझ को पाने के लिए निम्न तथ्यों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है-
1.इस भौतिक संसार में जो कुछ है वह नश्वर है।
2.ये नश्वरता अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धान्त के कारण है, अर्थात प्रत्येक भौतिक वस्तु और जीव का स्वरूप परिवर्तन अनिवार्यतः होता ही है।
3.इस भौतिक संसार और इसके अवयवों को हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से समझते हैं यानी हमारी इन्द्रियाँ निरन्तर इस संसार और इसके अवयवों के सम्पर्क में आती हैं और इन्द्रियों द्वारा अपने गुणों के अनुसार इनका अनुभव किया जाता है जिसे हम अपना अनुभव कहते हैं।
4. जब परिवर्तन और स्वरूप परिवर्तन अवश्यम्भावी है ही तो फिर इन परिवर्तनों पर इन्द्रियों के द्वारा सम्प्रेषित सुख और दुख के अनुसार ही सुखी या दुखी होने का कोई कारण नहीं है। अर्थात हमें इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचना के प्रति स्थिर रहना चाहिए और सुखी या दुखी होने से बचना चाहिए।
5.परिवर्तन के सिद्धांत के अनुसार सुख दुख के ये सभी भाव अस्थाई ही हैं सो भी इनके प्रभाव से बचना चाहिए।
6. इन्द्रियों द्वारा प्रकृति के अनुभव किये जाने और उन अनुभवों से अपने को अप्रभावित रखने हेतु ताकि हम स्थिरचित्त बने रहें ये आवश्यक है कि हमारा नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर यानी अपने सेंसेज पर बना रहे।
7. इन्द्रियों की अनुभूति हमें अस्थिर न कर दे इसके लिए जरूरी है कि अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धांत को आत्मसात कर लें।
8. प्रकृति में हर क्षण होने वाले परिवर्तन को समझने के लिए ये जरूरी है कि हम स्वयम को चलायमान न होने दें। अगर हम स्वयम चलायमान होंगे तो फिर प्रकृति के परिवर्तन को समझ नहीं पाएंगे, उसकी गति और दिशा को नहीं जान पाएंगे और भ्रम में पड़ जायेंगे।
9.जिस इंसान में उपरोक्त क्षमताएँ विकसित अवस्था में हो जाती हैं उसे अमृत की प्राप्ति होती है। अमृत अमरत्व प्रदान करता है। तो इसका अर्थ हुआ कि इस तरह का इंसान नश्वरता से और परिवर्तन अर्थात स्वरूप परिवर्तन से जीते जी मुक्त हो जाता है। उसका ईगो यानी उसका अहम समाप्त हो जाता है क्योंकि प्रकृति के परिवर्तनों से वह अप्रभावित होता है।
10. जब इस प्रकार अप्रभावित होता है तो उस समय उसका स्व यानी उसका SELF उसके समक्ष उपस्थित होता है जो नितांत अपरिवर्तनीय, अनश्वर और सभी प्राणियों में एक समान होता है अर्थात हर किसी का SELF यानी स्व यानी आत्मबोध एक समान होता है। इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त व्यक्ति होता है। यानी मोक्ष जीवित रहते प्राप्त होता है न कि मरने के पश्चात।
इन शिक्षाओं की भाषा निश्चित रूप से हमारे दैनिक जीवन की भाषा से भिन्न है। लेकिन ये सीख सिर्फ उनके लिए ही नहीं है जो धर्म के मर्म को समझते हैं बल्कि ये शिक्षाएँ इतनी सरल हैं कि अगर हम आप मनोयोग से उन्हें सुने जाने तो हमें लगने लगेगा कि अभी तक हम सिर्फ इसलिए परेशान रहते आएं हैं क्योंकि हम खुद को इस सच्चाई से रूबरू नहीं होने दिए थे। हमारे जीवन में प्रयुक्त होने वाले अगितन मुहावरों, लोकोक्तियों में ये शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं , उनका कहने सुनने में हम उपयोग भी करते आये हैं लेकिन कभी ध्यान से इनका चिंतन नहीं किये। अगर किये रहते तो सुखी भी होते और खुश भो रहते। और तब लक्ष्य से दूर भी नहीं रह जाते।
ये शिक्षाएँ काल विशेष से बंधी नहीं हैं। वस्तुतः ये शिक्षाएँ समय की सीमा से बाहर हैं, सर्वकालिक हैं
दूसरी बात कि जीवन में हमारी व्यवसायिक सफलता चाहे जतनी बड़ी हो जीवन में शांति तभी मिलती है जब जीवन जीने का ढंग पता हो, दृष्टिकोण परिपक्व हो। ये परिपक्वता शैक्षणिक और तकनीकी ज्ञान की और आर्थिक संसाधनों की प्रचुरता से नहीं आती। इन प्रचुरताओं के बावजूद भी यदि जीवन को देखने का ढंग सही नहीं है तो हम बार बार कभी प्रसन्नता और कभी दुख के अतिरेक में फंस कर तनावग्रस्त हुए रहते हैं। तनाव हमारे मानसिक अवस्था को आंदोलित (agitated) करते रहता है जिससे हम बार बार अस्थिर होते रहते हैं। स्थायित्व का अभाव ध्यान बँटाता है। नतीजे में हम न केवल आत्मिक लक्ष्य से दूर होते जाते हैं बल्कि अपने भौतिक लक्ष्यों से भी भटकते हैं। इससे हमारी न केवल आत्मिक यात्रा दुष्प्रभावित होती है, बल्कि हमारी भौतिक यात्रा भी दुष्प्रभावित होती है।
इन शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन के प्रसंगों में में लागू करके देखें। जीवन की हर छोटी बड़ी घटना के परिपेक्ष्य में देखें और इन शिक्षाओं को उन प्रसंगों की कसौटी पर कसें। घर की अच्छी बुरी बात हो, छात्र जीवन की सफलता असफलता हो, व्यवसाय की भली बुरी बातें हों, रिश्तों की बातें हों या अन्य कोई भी प्रसंग, हम पाते हैं कि ये शिक्षाएँ न सिर्फ व्यवहारिक हैं बल्कि हर प्रसंग में एक आत्मबल भी प्रदान करती हैं। ये हमें सुख में खुश होकर बौराने से बचाती हैं और दुख में निराश होकर बिखरने से भी बचाती हैं। ये शिक्षाएँ हमें हर परिस्थिति से अछूता रहकर साध्य की तरफ बढ़ने का रास्ता बताती हैं। मोक्ष यानी आत्मसाक्षात्कार परम् स्थिति है, जो निरन्तर अभ्यास से मिलती है। अभ्यास की पहली सीढ़ी अपने जीवन के दैनिक प्रसंग ही होते हैं। यदि हम अपने दैनिक प्रसंग में खुद को अनुशासित नही रख सकते तो फिर बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना भी असम्भव ही रह जाता है।अवश्यभावी परिवर्तन और नश्वरता के इस शिक्षा से हमारे अंदर अपने सेल्फ को खोज पा लेने के कारण हमें सत्य के प्रति जो लगाव मिलता है उससे हमें एक आत्मबल प्राप्त होता है । ऐसा क्षमता युक्त व्यक्ति अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय हो जाता है।