क्या धर्म जरूरी है?
क्या श्रीमद्भागवद्गीता का दर्शन अत्यधिक आत्मकेंद्रित व्यक्ति की रचना करता है, एक ऐसा आत्म केंद्रित व्यक्ति जो व्यक्तिगत स्तर पर तो बहुत सफल होता है किंतु समाजिक हित के नाम पर इतना रक्तपात करता है कि समाज में अवसाद , और रुदन ही बच सकता है? अतिआत्मकेंद्रित व्यक्ति आत्मकल्याण की बात तो सोच सकता है किंतु उसका व्यक्तिवाद समाज के व्यापक साझा हित से कैसे जुड़ सकता है? पारलौकिकता और पुनर्जन्म की ओट में महानता की रचना करते करते क्या व्यक्ति के स्वयम की उपलब्धि को गौण कर दिया जाता है ताकि व्यक्ति अपने सामर्थ्य पर भरोसा कर व्यवस्था को चुनौती नहीं दे सके?
अगर पांडव सत्ता के लिए नहीं लड़ते अथवा कोई अन्य मार्ग पर चले जाते या कौरवों की अधीनता स्वीकार कर लेते तो समाज में ऐसा कौन सा पतन हो जाता जो बाद में नहीं हुआ? न कृष्ण की नगरी बची , न पांडवों का साम्राज्य बचा, और न धर्म का सामाज्य ही कालजयी हो पाया , धर्मयुद्ध से यही हुआ न की द्वापर खत्म होकर कलियुग का प्रादुर्भाव हो गया। तो आखिर मिला क्या?
दुनिया भर की समस्याओं की जड़ में कँही न कँही ये सब चीजें हैं जो हमेशा हमारे दैनिक जीवन और हमारी दृष्टि को प्रभावित करती हैं। सो काल कोठरी में बैठी काली बिल्ली चाहे कितनी भी काली क्यों न हो उसपर बात किये बिना आप आगे बढ़ें तो नहीं बढ़ पाएंगे । जिस समाज में इंसान रहता है उसमें इस प्रश्न का बहुत महत्व रहा है और आज भी है तथा AI की दुनिया में भी रहेगा क्योंकि नैतिकता का सवाल AI के संदर्भ में अभी से उठ रहा है और धर्म के बिना नैतिकता अपनी शक्ति खो देती है क्योंकि तब नैतिकता रैशनलिटी की कसौटी पर कसी जाती है और उस कसौटी पर पिछड़ जाती है। सो धर्म और अध्यात्म के प्रश्नों से हम भाग नहीं सकते भले ही व्यक्तिगत स्तर पर हमें इनपर कोई भरोसा हो या न हों। धर्म के स्थूल स्वरूप से मनुष्य तभी अलग हो सकता है जब व्यापक जनसंख्या तकनीक और नैतिकता को ग्रहण कर पाए लेकिन ऐसा होता दिखता नहीं है।
याद कीजिये कि जब समाज में पूँजी का जन्म हुआ तो वह महान क्रांतिकारी कदम था लेकिन जल्द ही पूँजी पर उनका कब्जा हो गया जो पूँजी पैदा करने वाले श्रम से दूर थे। इसी प्रकार यदि तकनीक के साथ हुआ तो तकनीक का उपयोग भी अल्पसंख्यक द्वारा बहुसंख्यक को अपनी अधीनता स्वीकार कराने के लिए होगा। पूँजी और तकनीक के मेल से बनी भावी सभ्यता में धर्म की भूमिका क्या हो सकती है ये दिलचस्प है। अभी तक तो धर्म तकनीक के साथ चलता रहा है। अल्पसंख्यक समाज का बहुसंख्यक समाज पर सत्ता बनाये रखने के लिए शायद ये जरूरी भी होगा।
सिक्के का दूसरा पहलू है कि धर्म की सकारात्मक भूमिका का अपना महत्व है। धर्म ने सिर्फ अंधविश्वास को ही नहीं बढ़ाया है, बल्कि बड़े साम्राज्यों के निर्माण, ज्ञान-विज्ञान के विकास, अर्थव्यवस्था के निर्माण में भी इसकी भूमिका रही है क्योंकि पहचान और बंधुत्व का एक बहुत बड़ा स्रोत रहा है धर्म। कम्युनिटी कल्चर के विकास, आपसी सहजीविता , एकजुटता, और नेशन-स्टेट के उदभव में भी धर्म एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। खुद हम अपने यँहा देखें तो देखते हैं कि उत्तर से दक्षिण तक , पूरब से पश्चिम तक हिन्दू धर्म की मूल धारा और उसके देवी देवता एक रहे और धार्मिक कहानियों ने इस भूभाग को एक देश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आदि शंकराचार्य का महत्व , गौतम बुद्ध का महत्व मौर्यो, मुगलों और अंग्रेजों से कमतर नहीं है भारत बनाने में। और ये धारा आज भी कायम है। भारतीय संस्कृति का उद्गम ही धर्म है न कि भारतीय शासन तंत्र।