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सोशल मीडिया

           सोशल मीडिया
सोशल मीडिया क्या है, इसे जरा समझने की कोशिश करनी चाहिए। सोशल मीडिया एक सार्वजनिक वर्चुअल मंच है जिसे कोई भी बिना किसी पूर्वशर्त के जॉइन कर सकता है और अपनी बात कह सकता है, और वह बात टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो, या इन तीनों के मिश्रण के रूप में हो सकता है। इस प्रकार सोशल मीडिया एक ऐसा वर्चुअल मंच है जिसपर उसके सदस्य कुछ भी कह सकने की स्थिति में होते हैं।
 इस प्रकार सोशल मीडिया सदस्यों को अपनी बात बेहिचक कहने की आजादी देती है। और यही आजादी वैश्विक स्तर पर सत्ताधारी वर्ग को परेशान करती है। पहले जब सिर्फ प्रिंट मीडिया और रेडियो/टीवी थे तो उनपर वही लोग बोल, लिख सकते थे जो उनसे व्यवसायिक रूप से जुड़े हुए थे या फिर इन मीडिया संस्थानों के द्वारा आमंत्रित किये जाते थे अर्थात अखबार, रेडियो,और टीवी पर आने के लिए देश का आम आदमी स्वतंत्र नहीं था, बल्कि वह मात्र उन मीडिया संस्थानो की बात सुनने और पढ़ने और देखने के लिए बंधा हुआ था, वँहा आम इंसान के मत की कोई जगह नहीं थी। इस प्रकार ये परम्परागत मीडिया संस्थान मत तैयार करने की फैक्ट्री भी थे(आज भी हैं)। ये संस्थान जैसा माहौल बनाते थे आप उसमें बहने के लिए बाध्य थे। रीडर्स कॉलम के छोटे से जगह में यदि किसी पाठक को कोई तीन पंक्ति की जगह मिल जाती थी तो वह उस पाठक के लिए बड़ी बात थी, हालांकि पाठक उस पत्र पत्रिका में छप चुके किसी मैटेरियल पर ही कुछ कह पाता था। रेडियो और टीवी ने तो पाठकों के लिए प्रिंट मीडिया की इस अत्यंत सूक्ष्म स्थल को भी निगल लिया था। रेडियो और टीवी में तो आप किसी कार्यक्रम के किसी रूप में यँहा तक कि एक ऐसे दर्शक के रूप में भी नहीं जुड़ पाते थे जिससे ये पता चले कि आप दर्शक के रूप में दरअसल क्या चाहते हैं। टीआरपी का सारा खेल इसी से गढ़ा जाता है कि आप जबरदस्ती क्या देख सुन सकने के लिए कितने बाध्य हो सकते हैं।
         इस प्रकार परम्परागत मीडिया  न्यूज़ आइटम से लेकर मत अभिव्यक्ति तक एक टीरेनिकल रूल चलाता रहा है। लेकिन तकनीक ने उसके इस टिरेनी को तोड़ डाला । तकनीक के सहारे वर्चुअल स्पेस तैयार किया गया जिसमें हर एक इंसान को अपनी बात कह सकने की आजादी मिली। मानव इतिहास में तकनीक ने पहली बार प्रजा को ये अधिकार दिया कि वो शासक से सीधे सवाल कर सके।और सुलभ इंटरनेट ने इस सुविधा को घर घर तक , हर आदमी तक पहँचा दिया। ऐसी स्थिति में मत बनाने के संथागत रोजगार पर से संस्थागत और पुरातन अथवा परम्परागत मीडिया का एकाधिकार समाप्त हो गया। पहले सरकारों के लिए इन मीडिया संस्थानों को नियंत्रित करने का आसान उपाय था क्योंकि ये संस्थान व्यक्ति या समूह विशेष के द्वारा संचालित थे और उन चंद लोगों या समूहों को प्रभावित कर लेना सरल था जबकि सोशल मीडिया के स्वामित्व भले किसी व्यक्ति या समूह विशेष के पास हो लेकिन कंटेंट क्या होगा इसपर उस स्वमित्व का कोई अधिकार नहीं हो पाता है। ऐसे में सरकारों के लिए सोशल मीडिया एक ज्यादा जटिल चैलेन्ज बन जाते हैं।
     चूँकि सोशल मीडिया का चरित्र सार्वजनिक होता है, निरतर गतिशील होता है सो सदस्यों को इसपर बने रहना आसान होता है। अब जब सरकारें इनको नियंत्रित करने की कोशिश कर रहीं हैं तो ये समझना जरूरी है कि सरकारों के तर्क क्या हैं और लेखक के रूप में आप कितने आजाद हैं। इसके लिए हमें ये जानना जरूरी है कि हम क्या कह सकते हैं। तो इस हेतु भारतीय संविधान की प्रस्तावना और  मौलिक अधिकारों से सम्बंधित धाराओं को देखना जरूरी हो जाता है जँहा आपको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हासिल जिनको लागू होने में शर्त इतनी भर है कि यह दूसरों की डिग्निटी के प्रतिकूल न हो और ये स्वतंत्रता भारतीय सुरक्षा और अखंडता चुनौती नहीं देता हो अथवा उनको खतरे में नहीं डालता हो। साफ है कि व्यक्ति के डिग्निटी और देश की सुरक्षा और अखंडता की बातें हैं न कि सरकार की सुरक्षा और अखंडता की। इस प्रकार सत्ता को पता है कि संविधान के दायरे में वह सोशल मीडिया के सदस्य लेखकों का बहुत देर तक बहुत कुछ नहीं बिगाड़ सकती है सो सरकारें वही करती हैं जो अब तक करते आई हैं यानी मालिक को पकड़ो। सो हम देखते हैं कि दुनिया भर की सरकारें सोशल मीडिया के कंटेंट से ज्यादा उन मीडिया स्वामियों पर आक्रमण करती हैं ताकि वे तकनीक के बल पर इस वर्चुअल स्पेस पर लोगों को नियंत्रित करें लेकिन यँहा दिक्कत है कि तकनीक की अपनी सीमाएँ हैं, और तकनीक पर अभी भी इंसान का नियंत्रण बना हुआ है, छूटा नहीं है। सरकारें भी इस बात को समझती हैं सो समझदार सरकारें सोशल मीडिया मालिकों से लड़ती ही नहीं हैं बल्कि सोशल मीडिया की खासियतों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल भी करती हैं और यही कारण है कि दुनिया भर की मजबूत और साधन संपन्न राजनीतिक दलों ने अपने अपने ट्रोल आर्मी पाल रखें हैं और ये सभी समन्वित रूप से कार्य भी करती हैं। लेकिन मजेदार बात है कि चूँकि अभी तक सोशल मीडिया मत फैक्ट्री के गैंग के एकाधिकार से बची हुई है सो एक ट्रोल के खिलाफ दूसरे ट्रोल भी हैं और फैक्ट चेकर भी हैं इस सोशल मीडिया पर। सो वर्चुअल स्पेस पर एक कमजोर इंसान भी ताकत पा लेता है और मत निर्माण कर पाता है। असीम स्थान वाले सोशल मीडिया ने आम इंसान को असीम और अकल्पनीय ताकत भी दिया है, उसे कम्युनिटी बेलोंगिगनेस की भावना भी दिया है।
     हर युग में मीडिया ने, जो व्यस्तुतः अभिव्यक्ति, संवाद और संचार का माध्यम है उसने क्रांतिकारी भूमिका निभाई है  फिर चाहे वो हैंडबिल हो जैसा बोल्शेविक क्रांति में था, चाहे टेलीग्राफ हो अमेरिका में  दास प्रथा के खिलाफ , चाहे रेडियो हो जिसके बदौलत रूजवेल्ट ने अमेरिकियों को युद्ध के कठिन समय में और आर्थिक बदहाली के समय में गजब का नेतृत्व दिया हो, चाहे भारत की आजादी की लड़ाई में अखबारों की भूमिका रही हो, चाहे पूरी दुनिया में टीवी की व्यापकता हो या फिर सोशल मीडिया की हर पल सजगता हो जिसने अभी अभी कोविड में सरकारों की नाकामियों को खुलेआम कर दिया हो। ये बात दीगर है कि मीडिया चटखारे लेने में हमेशा आगे रहा है और ये काम सोशल मीडिया पर पहली बार हो रहा हो ऐसी बात भी नहीं है। जब पश्चिम में पहली बार प्रेस आया तो पहली बेस्ट सेलर किताब विच हंटिंग पर थी। लेकिन इससे प्रेस की ताकत पर हम सवालिया निशान नहीं लगा सकते। इसी प्रकार सोशल मीडिया पर ट्रोल और फेक न्यूज़ की भरमार के बावजूद ये जनता की आवाज का सबसे सशक्त साधन है इसपर सवाल नहीं कर सकते।

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