सत्य , विशेषकर अरुचिकर सत्य से बचने का एक तरीका है कि सत्य की ब्रांडिंग कर दी जाए, यानी उसे एक वर्ग/समूह/व्यक्ति विशेष से टैग कर उस वर्ग/समूह/व्यक्ति की भर्त्सना प्रारम्भ कर दी जाए, सत्य की भर्त्सना स्वतः हुई मान ली जाएगी। ये तरीका इसलिए भी बहुत कारगर है क्योंकि इसमें बुद्धिजीवी वर्ग को विशेष सुविधा मिल जाती है और जो वर्ग कम जागरूक है उस सत्य के प्रति उसे भी आसानी से विश्वास दिलाया जा सकता है कि ये तथ्य असत्य है क्योंकि ये तथ्य फलाना कह रहा है। #फ़ेकिंग ऑफ ट्रुथ# की इससे सरल प्रक्रिया क्या हो सकती है, साँप भी मर गया लाठी भी नहीं टूटी।।आप भी समझ गए कि वो सब झूठ है जो स्पष्ट है और सिर्फ इसलिए झूठ है कि क्योंकि उसको कहने , बताने वाला आपकी नजर में , आपकी मान्यताओं में गलत है या संदिग्ध है या विरोधी है। आज के इंफोडेमिक के समय में ये कितना आसान है! आज से पहले सूचनाओं की इतनी तीव्र गति से बढ़ती भीड़ नहीं हुआ करती थी। तब आपके पास समय था कि आप सूचना को तौलें, सूचनादाता को नहीं। आज आपने अधिक से अधिक सूचना पाने की होड़ में समझने जानने की उस प्रक्रिया को ही उलट दिया है। ऐसी स्थिति में सर्वाधिक नुकसान उसे ही उठाना होता है जो सूचना के तथ्य के रिसिविंग एन्ड पर है। दरअसल फ़ेकिंग ऑफ ट्रुथ से शुरू हुई प्रक्रिया फ़ेकिंग ऑफ पर्सन पर जाकर खत्म होती है।
यदि आप समझना चाहें तो ठीक है नहीं तो फेक्ड आइडेंटिटी के अंध सुरंग में विलीन होते रहिये, जीते जी आपके अस्तित्व भी फेेक होते चला ही जायेगा और इससे अनजान आप झूठ को नहीं सच कहने वाले को कोसते रह जाइएगा।
गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके। श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं। ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....