विकास के कई मॉडल हो सकते हैं, उन मॉडलों में लक्ष्य की प्राप्ति यानी विकास को सुनिश्चित करने के कई सिद्धान्त हो सकते हैं। यदि हम खुद को सिर्फ औद्योगिक विकास तक ही सीमित रखें तब भी न तो मॉडलों और न हीं सिद्धान्तों की कोई कमी है। इन सब के बाउजूद कुछ मूलभूत कारक ऐसे है जो किसी भी विकास के प्राणवायु होते हैं , जिनपर चर्चा , चाहे संक्षिप्त ही सही आवश्यक है।
आत्मनिर्भरता की अवधारणा न तो नई है न ही पुरातन। वस्तुतः विकास की अवधारणा में ही आत्मनिर्भरता एक अनिवार्य तत्व की रूप में उपस्थित होता है। जब भी विकास होगा, वो कुछ न कुछ आत्मनिर्भर करेगा ही और जब आत्मनिर्भरता की प्राप्ति का प्रयास होगा तो वो बिना विकास के प्राप्त ही नहीं हो सकेगा।
अब लौटते हैं विकास के अनिवार्य कारक की तरफ। किसी भी विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि कहें कि अनिवार्य है कि विकास की प्रक्रिया में लगे जीवित पूँजी यानी मानव श्रम जो बौद्धिक भी होगा और शारीरिक भी वो सक्षम हो और उसकी सक्षमता के लिए पोषक तत्वों के साथ साथ उसका स्किल भी काल और स्थान के अनुसार उन्नत हो। बिना उन्नत मानव पूँजी के विकसित हो पाने के प्रयास की सफलता की आशा करना ठीक उसी प्रकार है जैसे बिना किसी प्रकाश श्रोत के रात्रि में देखने की बात की जाए। सो उन्नत मानव पूँजी को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है उस मानव पूँजी के स्किल को विकसित किया जाए यानी उसे शिक्षित किया जाए। इस प्रकार किसी भी आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है कि जिस प्रकार हम भौतिक इंफ्रास्ट्रक्टर में आर्थिक निवेश करते हैं उसी प्रकार शिक्षा और तकनीकि स्किल में भी निवेश करें। आज के जटिल आर्थिक परिदृश्य में आर्थिक विकास सिर्फ उत्पादन के मौलिक क्रिया कलापों पर नहीं निर्भर करता है बल्कि उस उत्पादन को अधिक से अधिक कॉस्ट इफेक्टिव और आमजनों के अधिक से अधिक सुविधाजनक उपभोग के लायक बनाने पर भी निर्भर करता है। इसके अतिरिक्त उपलब्ध तकनीक के उत्तोरोत्तर विकास की भी जरूरत होरी है जो तभी सम्भव होती है जब उत्पादन की प्रक्रिया में लगा मानव पूँजी उन्नत रूप से शिक्षित और तकनीकी दृष्टि से विकसित हो।
आर्थिक विकास की केंद्रीयकृत सिद्धान्त को अपनाया जाए या विकेन्द्रीयकरण को , इसपर पर्याप्त मतभेद सम्भव है लेकिन उत्पादन प्रक्रिया में लगी मानव पूँजी अधिक से अधिक स्किल्ड हो इसमें किसी विवाद की गुंजाइश नहीं है।
आर्थिक आत्मनिर्भरता का कोई भी प्रयास बिना शैक्षणिक आत्मनिर्भरता के सम्भव ही नहीं है। उनस्किलड लेबर से स्किल्ड आर्थिक संरचना की स्थापना की उम्मीद करना बेमानी है। आप खुद देख सकते हैं कि जो भी राष्ट्र औद्योगिक रूप से विकसित हैं , चाहे वो जिस राजनीतिक मॉडल को अपनाते हों, जैसे साम्यवादी(?) चीन हो, या लोकतांत्रिक अमेरिका-यूरोप हों वे सभी देश शैक्षणिक दृष्टि से भी उन्नत हैं। दुनिया के नामी गिरामी विश्वविद्यालय जो शोधों के हब हैं वे सभी इन्हीं देशों में हैं। इन सभी देशों ने एक तरफ अपने आर्थिक ढाँचे में जबरदस्त निवेश किया है तो दूसरी तरफ मानव पूँजी को उन्नत करने के लिए शिक्षा में भी उसी तरह का निवेश किया है।
अतः किसी भी आर्थिक विकास के आर्थिक पैकेज में यदि शिक्षा उपेक्षित होती है तो फिर आर्थिक विकास की उम्मीद करना बेमानी है।