श्रीमद्भागवत गीता का महत्व
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श्रीमद्भागवत गीता ने धर्म को परिभाषित करते हुए धर्म को आडम्बरमुक्त कर उसे सत्यरूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है।
प्रथम अध्याय में हम सीखते हैं, जानतें हैं कि कैसे और किस परिस्थिति में मनुष्य धर्म की खोज में आत्मान्वेषण और आत्मसाक्षात्कार के पथ पर चलने को उद्द्यत होता है।
हम प्रथम अध्याय में जानते हैं कि सन्मार्ग पर चलने के पूर्व हम किस तरह व्यथित और भटके हुए होते हैं, बेचैन रहते हैं फिर भी खुद को सर्वज्ञानी समझने लगते हैं। इस अवस्था में तर्क वितर्क काफी करते हैं और दुखी रहते हैं। सभी भौतिक सुख सुविधा की उपलब्धता के बावजूद मन भटकता हुआ पलायनवादी मार्ग पर चल पड़ता है। ठीक यही अवस्था होती है जँहा से आगे जाने के लिए दो मार्ग होते हैं, एक व्यकुलता का मार्ग होता है जिसपर चलना सबसे आसान होता है। तथाकथित धर्म के लिए मन हिंसक हो उठता है, पहली हिंसा खुद के साथ होती है, विवेक को मारकर, फिर हमारी हिंसा जल्द ही व्यापक हो जाती है जिसका अंत सर्वनाश में होता है। दूसरा मार्ग कल्याण का है, जिसमें हिंसा, लोभ, लालच, क्रोध आदि का अंत होता है। व्याकुल मन के इसी अंतर्द्वंद्व और इसी मार्ग को दिखाता है श्री मद्भागवत गीता का द्वितीय अध्याय। यँहा से सन्मार्ग का प्रारम्भ होता है।
द्वितीय अध्याय में हम सीखते हैं कि एक दिग्भ्रमित, व्याकुल पथिक जिसे माया, मोह, हर्ष, विषाद, क्रोध, कामना के कारण आगे जाने का मार्ग ही नहीं दिखता उसे योगेश्वर श्रीकृष्ण मार्ग दिखाते हुए उस पथिक को आत्मा, ज्ञान, कर्म और भक्ति से परिचित कराते हैं। ये चारों वो मित्र हैं जो जिस राही के साथ लग जाएं उसकी ही राह आसान कर दें। श्रीकृष्ण ने बहुत ही परिमार्जित शब्दों में इनका उल्लेख किया है जिनका सामान्य बोल चाल की भाषा में इतना ही मतलब है कि जो इंसान आत्मा की अजरता अमरता पर भरोसा करता है, जो अपने गुणों के अनुसार अपने कल्याण का रास्ता चुनता है जो उसे उसके इन्द्रियों पर विजय दिलाते हैं, उसके अंदर अच्छे गुणों को विकसित कराते हैं , जो अपने इष्ट पर भरोसा रखता है और इस बात की फिक्र नहीं करता कि उसके अच्छे प्रयासों का क्या फल होगा वही आगे बढ़ता है। ऐसा आदमी जीवन भर इन मित्रों को अपने साथ रखता है। आप कौन से धर्मावलम्बी हैं ये प्रश्न गौण है, बल्कि आपके सद्गुण क्या हैं, आपमें अपने गुणों के अनुसार ऊपर उठने की कितनी क्षमता है, आपको अपने प्रयासों के फल से कितनी कम आसक्ति है ये मायने रखते हैं।
तृतीय आधाय में श्रीकृष्ण का मत है कि आदमी को तो कर्म करना ही है, लेकिन सवाल उठता है कि आदमी वो कौन सा कर्म करे जिससे उसका उत्थान हो सके। तब आगे तीसरे अध्याय में श्री कृष्ण बताते हैं कि जिस कर्म को करना है वो नियत है। तो फिर नियत क्या है? द्वितीय अध्याय को फिर से याद कीजिये जिसमे दैवी गुणों को विकसित करने की बात बताई गई थी। साथ ही इंद्रियों को नियंत्रित कर उनकी दिशा सद्गुणों की तरफ करने की सीख दी गई थी। वस्तुतः यही नियत कर्म है, यही यज्ञ है, यही आराधना है जिसके बल पर इंसान एक एक सीढ़ी चढ़ता परम् कल्याण को प्राप्त होता। न कोई आडम्बर, न कोई कर्मकांड, न कोई साम्रदायिक विवाद। न देवताओं का बंटवारा न ईश्वर के नामकरण का बोझ। आप स्वयं के दैवी गुणों का विकास करें , अपने इंद्रियों को साधे आप इश्र्वरत्व की तरफ अग्रसर होंगे।
तृतीय अध्याय में योगेश्वर ने रेखांकित किया है कि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है और कर्म की ही एक स्थिति युद्ध है। मतलब? जब हम कर्म पथ पर अग्रसर होते हैं तो हमें कुछ सावधानियों को बरतना होता है, जैसे
1. हमारा कर्म हमारे गुणों से निर्धारित होता जा, इसमें नकल की कोई गुंजाइश नहीं होती। अर्थात सभी के कर्म समान नहीं हो सकते।
2.जब हम कर्म पथ पर चलते हैं तो इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पण अनिवार्य है, बिना कर्मफल में आसक्त हुए, बिना कर्मफल की चिंता किये, इष्ट पर निर्भर हो कर अपने गुणों के अनुसार कर्म में बढ़ना होता है।
3. निरन्तर स्वयं को परिमार्जित करना अनिवार्य है। इष्ट पर निर्भरता, श्रष्ठ जनों की सेवा, अपने अंदर सद्गुणों का विकास, इंद्रोयों का शमन अर्थात काम, क्रोध, राग, द्वेष, लोभ, माया, मोह से धीरे धीरे मुक्ति, इष्ट का चिंतन यही कार्य करने होते हैं। धीरे धीरे गुणों का परिमार्जन होता है, मनुष्य के रूप में हम निकृष्ट से उत्कृष्ट की यात्रा पर होते हैं , यही कर्म है जो कालांतर में हमें ईश्वरत्व की प्राप्ति कराता है। अपने अवगुणों से पार पाने की क्रिस, दुर्गुणों से मुक्त होना ही युद्ध है जो मनुष्य के अंदर होता है न कि युद्ध क्षेत्र में या किसी मैदान में। दूसरों को पराजित करना युद्ध नहीं, विजय नहीं है बल्कि अपने आसुरी गुणों को हराना और अपनी इंद्रियों का शमन ही युद्ध है।
तृतीय अध्याय में इसे रेखांकित तो किया गया है परंतु कर्म और यज्ञ की विधि आगे के अध्यायों में स्पष्ट की गई है।
चतुर्थ अध्याय गीता को समझने की कुंजी है जिसमें योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अवतार, कर्म,यज्ञ, योग, युद्ध और मोक्ष को स्पष्ट किया है।
जब जब हम कर्म के बारे में सोचते हैं तब तब भ्रमित होते हैं। योगेश्वर ने समझाया कि कर्म नियत है। क्या नियत है? वो प्रक्रिया नियत है जिससे कर्म होता है, जो निम्न है
1.गुरुसेवा
2.गुरुसेवा से अपने अंदर अच्छे गुणों का विकास
3.अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण, उनका शमन
4.इष्ट में प्रवेश की क्षमता की प्राप्ति
ये चारों कर्म क्रमिक हैं और प्रत्येक मनुष्य को अपनी क्षमता के अनुसार ही कर्म में प्रवृत्त होना चाहिए, न कि दूसरे की नकल कर।
इन नियत कर्मों को करना ही यज्ञ है । यही आराधना है। जब मनुष्य इस कर्मपथ पर बढ़ता है तो उसके अंदर की बुरी प्रवृत्तियां उसपर हावी होने की कोशिश करती हैं। यंही पर अंदर की अच्छी और बुरी प्रवृत्तियों में संघर्ष होता है और यही युद्ध है। अंततः जब मनुष्य अपने आसुरी गुणों पर विजय प्राप्त कर लेता है, अपने दुर्गुणों से मुक्त हो जाता है तो उसकी आत्मा परमात्मा से मिल जाती है। यही योग है। यही आत्मसाक्षात्कार है। इष्ट के प्रति यही अनुराग उसके अंदर ईश्वर का अवतार दिलाता है।
पूरी गीता में आत्म उत्थान की विधि बताई गई है जिसमें कोई कर्मकांड नहीं है, कोई दिखावा नहीं है, किसी साम्प्रदाय विशेष की विधि नहीं है। यह तो मानवमात्र के प्रगति का मार्ग है।
सदस्यों के जुड़ने और बिछड़ने का सिलसिला तो लगा ही रहता है, कोई जुड़ता है तो कोई बिछड़ता है। लेकिन योगयुक्त व्यक्ति को इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। चतुर्थ अध्याय तक श्री कृष्ण से समझा चुके हैं कि आपका कल्याण किस मार्ग पर चलकर होगा, कैसे होगा। मार्ग मात्र एक है, निष्काम कर्म का, अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप उस मार्ग पर अपने ज्ञान के बल पर बढ़ना चाहेंगे या इष्ट पर स्वयं को सौंपकर भक्ति भाव से। दोनों ही रास्तों में एक ही कर्म को करना है, यज्ञ को अर्थात आराधना को अर्थात अपने गुणों की श्रेणी के अनुसार गुरुजनों की सेवा, सद्गुणों का विकास, अपनी इंद्रियों पर सम्पूर्ण नियंत्रण, इष्ट में मिलने की उत्कट आकांक्षा। और जब ये अंतिम स्थिति प्राप्त हो जाती है तो आप इसी जन्म में देवत्व/इश्र्वरत्व को प्राप्त होते हैं। ये आप ही हैं जो आपका कल्याण कर सकते हैं। ये आप ही हैं जो ईश्वर भी हो सकते हैं। ये आप ही है कि आप भी श्रीकृष्ण हो सकते हैं। मतलब इतना ही है कि ये आप ही हैं जो अपना कल्याण कर सकते हैं और तदुपरांत आप जीते जी ही सारे बन्धनों से मुक्त हो सकते हैं। आपके अंदर इसी विश्वास को जगाता प्रस्तुत है श्रीमद्भागवत गीता का पंचम अध्याय
पांचवे अध्याय में श्रीकृष्ण द्वारा दी गई शिक्षा को कुछ यूँ समझा जा सकता है। मनुष्य के कल्याण का मार्ग निष्काम कर्म का मार्ग है जिस मार्ग पे चलने वाले के अंदर काम, क्रोध, राग, द्वेष नहीं होते;जिसे अपनी इंद्रियों की अधीनता नहीं होती अर्थात जो माया, मोह से मुक्त होता है; जिसका एकमात्र लक्ष्य अपने अंदर की दैवी गुणों अर्थात सद्गुणों का विकास होता है;जिसे न तो बाहरी दुनिया के आकर्षण बाँध पाते हैं न ही जिसकी अपनी कोई ईक्षा होती है जो बाहरी दुनिया को प्रभावित करे; जिसकी नजर में सभी समान हैं। इसी मार्ग पर चलने वाले को सन्यासी भी कहते हैं , योगी भी कहते हैं, मुनि भी कहते हैं और यही महात्मा परमेश्वर भी होता है। इस मार्ग पर चलने की विधि उसी कर्म विशेष में जिसे हमने चौथे अध्याय में जाना है, अर्थात सद्गुरु की सेवा, सद्गुणों का विकास, इंद्रियों पर विजय , कर्मफल से अनासक्ति इत्यादि। और यह क्रमिक है न कि नकल कर तुरत प्राप्त किया जा सकता है। आप अपनी प्रवृत्ति को जाने , उसके अनुसार इस मार्ग पर अग्रसर हों, आप भी योगी, सन्यासी, मुनि, और परमेश्वर हो सकते हैं और जीवित रहते हो सकते हैं। बिना इस कर्मपथ पर चले आप निष्कामी नही हो सकते। नकल, प्रपंच, भाषणबाज़ी नहीं बल्कि उपरोक्त क्रियात्मक कर्म जिसे आराधना और योग भी कहते हैं से परम नैष्कर्म्य की स्थिति प्राप्त होती है। पुनः याद रखें काम, क्रोध, राग, द्वेष, माया, मोह,से मुक्ति ही सन्यास दिलाती है और यह इसी संसार में रहकर, निष्काम कर्म कर के ही प्राप्त हो सकता है। अन्य कोई मार्ग नहीं है।
षष्ठम अध्याय में श्रीकृष्ण एक बार पुनः दैवी गुणों के उत्थान और इंद्रियों को बस में कर कर्म करने पर जोर देते हुए आत्मा के उत्थान की बात करते हैं क्योंकि ऐसा नहीं होने पर आत्मा का पतन होता है जो इंसान के पतन का कारण होता है। इसी को केंद्रीय विषय बनाकर योग में अर्थात आत्मा के परमात्मा से मिलन की विधि को रेखांकित करते हुए योगेश्वर ने षष्टम अध्याय में इसके क्रियात्मक विधि को बताया है।
तो आइए हम जाने कि योग की विधि क्या है, यज्ञ कैसे करते हैं, आराधना किस तरह की जाती है, कर्म करने का तरीका क्या है, अभी तक प्रथम से पंचम अध्याय तक हमने जो भी सीखा उसे क्रियात्मक रूप कैसे दें।
पहले छह अध्यायों में गीता के मुख्य सिद्धान्तों को प्रतिपादित करने के उपरांत श्रीकृष्ण ने सातवें अध्य्याय में विस्तार से बताया है कि गीता की शिक्षा अर्थात परमतत्व परमात्मा की प्राप्ति का क्या मार्ग है। अत्यंत संक्षेप में उनकी इस शिक्षा के सम्बंध में इतना ही कहा जा सकता है कि सकाम से निष्काम की तरफ अग्रसर होकर ही हम सब अपनी आत्मा का शोधन कर सकते हैं। तत्पश्चात हम उसी अवस्था में होते हैं जिस अवस्था में ईश्वर है, अर्थात निर्लेप, निष्काम, दैवी गुणों से परिपूर्ण। इस हेतु हमें सद्गुणों पर परम् श्रद्धा रखते हुए निष्काम भाव से बढ़ना होता है। अपनी प्रकृति में लगातार उत्थान करते हुए परम् श्रद्धा से गुरुजनों की सेवा, अपने अंदर सद्गुणों का परिमार्जन, इंद्रियों का सयम करते हुए उनकी दिशा और दशा को सद्गुणों के अनुरूप प्रवृत्त करते जाना और ये भरोसा रखना कि इसी मार्ग से हमारा कल्याण होगा, इसी मार्ग से समाज का कल्याण होगा , ये ही हमारी यात्रा है जिसे यज्ञ या योग कह कर गीता में सम्बोधित किया है योगेश्वर ने। परम् श्रद्धा ही परमात्मा का साक्षात्कार कराती है।
इसी बात को श्रीकृष्ण ने सप्तम अध्य्याय में सिखाया है।
अष्टम अध्य्याय में श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्मयोग की शिक्षा को आगे बढाते हुए समझाया है कि ईश्वर पर अनंत श्रद्धा रखते हुए मन से सारी इंद्रियों के सारे आकर्षणों को बस में करते हुए जो मन की इक्षाओं से ऊपर उठता है उसे ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। जब समस्त इंद्रियों का निरोध हो जाता है, मन मात्र ईश्वर की चिंतन में लगा होता है , अपनी प्रकृति अर्थात अपने गुण समाप्त हो जाते हैं उसी अवस्था में मोक्ष प्राप्त होता है। मोक्ष मृत्यु के बाद नहीं बल्कि जीवन में ही प्राप्त हो सकता है।
वस्तुतः श्रीकृष्ण इतना ही समझा रहें हैं कि ईश्वर पर अटूट श्रद्धा रखते हुए निष्काम कर्म करो अर्थात अपने दैवी गुणों को समृद्ध करते जाओ, इंद्रियों को बहकने मत दो, काम, क्रोध, राग,द्वेष , हिंसा आदि से मुक्त कर लो तब मोक्ष को प्राप्त होंगे, ईश्वरत्व को प्राप्त होंगे,और ये सब जीवित रहते प्राप्त करोगे। यही जीवन का अंतिम लक्ष्य भी है।
एकमात्र ईश्वर की आराधना की शिक्षा है नवम अध्य्याय में। शिक्षा का सारांश है, सब तर्क वितर्क को भूलकर, अप्रतिम भक्ति भाव से ईश्वर पर निर्भर रहकर पूर्ण निष्काम भाव से ईश्वरीय गुणों का स्मरण करें, उनको आत्मसात करने का यत्न करें, उनको व्यवहार में उतारें, आप निश्चित ही ईश्वर के पद को प्राप्त करेंगे। अनन्य श्रद्धा, अनन्य भक्ति, और ईश्वर पर अनन्य भरोसा आपको आपके गन्तव्य पर पहुँचा देंगे।
वैसे तो दशम एवम एकादश अध्य्याय में ऐसा लगता है कि ईश्वर अपनी महिमा का बखान एक तुक्ष इंसान के समक्ष कर रहें हैं, किसी किसी को तो ये दो अध्य्याय आत्मप्रवंचना सा लगता है तो किसी को अहंकारयुक्त भाषण।
वस्तुतः इन दो अध्यायों में योगेश्वर ने ईश्वर के उन गुणों को वैभव सहित कहा है ताकि हम उन विभूतियों की तरफ आकर्षित हो सकें। सच ये है कि ईश्वरत्व की ये विभूतियाँ दैवी गुणों से ही उपजती हैं जो निष्काम कर्म की पराकाष्ठा पर खुलकर खिलती हैं। इन दो अध्यायों में श्रीकृष्ण ने दिखाया है कि दैवी गुणों के साथ निष्काम कर्म के पथ पर बढ़ते जाते व्यक्ति के अंदर कौन सी क्षमताएँ उत्पन्न होती हैं और वो किस ईष्वरीय स्वरूप को प्राप्त करता है।
तो आइए हम सब ईश्वर सदृश्य बनने हेतु इन ईश्वरीय स्वरूपों को देखे, समझे और अपनाएं। देखें कि निष्काम कर्मयोग के मार्ग से चलते चलते हम किस मंजिल पर पहुँच जाते हैं, हम वही हो जाते हैं जो प्रभु हैं।
मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने के मार्ग को अबतक श्रीकृष्ण कई बार स्पष्ट कर चुके हैं। पुनः द्वादश अध्य्याय में योगेश्वर इस बात पर जोर देते हैं कि यदि आप अपनी श्रद्धा को अपने इष्ट पर समर्पित कर के आराधना करते हैं अर्थात इष्ट के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ आप अपने दैवी गुणों का निष्काम भाव से उत्थान करते हैं तो फिर आपके अंदर की सारे सद्गुण जागृत हो उठते हैं। जिनके प्रभाव से आपका निरन्तर उत्थान होते होते आप उस जगह पहुंच जाते हैं जँहा से वापस आने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, अर्थात आप मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
मानव के कल्याण का एकमात्र मार्ग उसके सद्गुणों का विकास ही है। फिर चाहे ये विकास आप अपनी समझ या ज्ञान से प्राप्त करें या स्वयम को इष्ट पर समर्पित कर। हाँ अपनी समझ अथवा ज्ञान पर टिके रहने के कुछ खतरे भी हैं जैसे इसमें खतरा है कि कँही आप आत्मकेंद्रित न जाएँ, कँही ऐसा न हो कि गुण अवगुण से मुक्त होने की बजाए आप अपने ही अहंकार के दलदल में न घन्स जाएँ। इसके विपरीत जब आप श्रद्धा और भक्ति से इष्ट के प्रति समर्पित हो निष्कामी हो कर अपने दैवी गुणों के विकास और अपनी इंद्रियों को वश में करते हैं तो आपको किसी तरह का भय नहीं होता कि आप कँही आत्मकेंद्रित अहंकार के जाल में आकर मार्ग भटकेगे। सो श्रीकृष्ण ने द्वाद्श अध्य्याय में भक्ति को ज्ञान के ऊपर प्राथमिकता दी है।
तेरहवें अध्य्याय में योगेश्वर ने समझाया कि किस तरह से शरीर के रहते शरीर से पार पाया जाता है। कोई भी युद्ध क्षेत्र इस शरीर से बाहर नहीं होता बल्कि ये शरीर ही एक युद्धक्षेत्र है। प्रत्येक व्यक्ति अपने युद्ध के लिए स्वयम ही उत्तरदायी है। ये शरीर है क्या? योगेश्वर ने इस शरीर का विस्तृत वर्णन किया है, जिसके अनुसार ये शरीर अपनी स्थूल काया के साथ अपने इंद्रियों, इंद्रियों के विषयों, उनकी प्रकृति और मन से बना है । इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का शरीर मात्र वही नहीं है जो स्थूल दिखता है, बल्कि इंद्रियों और मन से इसका विस्तार अनंत अंतरिक्ष तक होता है। इसी शरीर में अच्छे और बुरे दोनों गुण होते हैं। इस शरीर का ज्ञाता वही है जो इस शरीर के रहते इसके विकारों को पहचान कर, मन सहित इंद्रियों को वश में कर के अपने दैवी गुणों का उत्तोरोत्तर विकास करते हुए इश्र्वरत्व को प्राप्त करता है। इस अध्य्याय में योगेश्वर ने पुनः स्पष्ट किया है कि अच्छाई और बुराई दोनों ही मनुष्य के शरीर के अंदर ही हैं।।अच्छे गुणों के विकास से मनुष्य ईश्वरत्व की तरफ अग्रसर होता है तो बुरे गुणों के विकास से अधोगति की तरफ। शरीर की व्याख्या करते हुए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि मनुष्य शरीर पंचतत्व, अहंकार, बुद्धि, चित्त, इंद्रियों और उनके विषय तथा मन के संयोग से बना होता है। इसी स्थूल शरीर में जिस तरह के संस्कार डाले जाते हैं मनुष्य वैसा ही होता है। जब आप मां-अपमान,दम्भ, क्रोध, माया, मोह, लोभ, हिंसा आदि बुराइयों को त्याग कर अहिंसा, क्षमा, मन-वाणी की सरलता, माया, मोह का त्याग , सद्गुरु की सेवा, इंद्रियों का मन सहित शमन कर , निष्काम कर्म में प्रवृत्त होते हैं तब उन्नति करते करते परम् ब्रह्म में लीन हो जाते हैं। इस प्रकार का व्यक्ति शरीर यानी क्षेत्र के भेदों को जानकर, सब करते हुए भी कर्ता न होकर अपने ही कर्मों का द्रष्टा बन जाता है। आगे बढ़ता है तो अनुमति प्रदान करने लगता है, फिर भर्ता बन भरण पोषण करता है, तत्पश्चात भोक्ता हो जाता है। ऐसी स्थिति में वो अपनी प्रकृति का स्वामी हो जाता है, जँहा से आगे बढ़ कर ब्रह्म में लीन हो जाता है। सामान्य समझ की बात इतनी भर है कि हमें अपने दुर्गुणों अर्थात आसुरी गुणों से मुक्त होकर , गुरु की सेवा, दैवी गुणों का संग्रह, इंद्रियों का शमन करते हुए निष्काम भाव से ईश्वर पर श्रद्धा बनाये हुए चलना चाहिए। इस क्रम में अपने शरीर के अंदर की बुरी प्रकृति को हराना होता है। आप इतना भर कर दीजिए, शेष आप स्वयम ही देखेंगे कि आपके अंदर ही अर्थात इसी नश्वर शरीर में ही ईश्वर का आगमन हो जाता है, आप इस शरीर के ज्ञाता हो जाते हैं। अपने गुणों से मुक्त होकर ही आप ईश्वरत्व की सीढ़ी चढ़ सकते हैं।
योगेश्वर ने इसी मार्ग को श्रीमद्भागवत गीता के तेरहवें अध्य्याय में समझाया है।
चौदहवें अध्य्याय में श्रीकृष्ण ने तीनों गुणों अर्थात सतो, रजो एवम तमो गुण को परिभाषित किया है, उनसे मुक्त होने की विधि बताई है और तीनों गुणों से मुक्त व्यक्ति की विशेषताओं को उल्लेखित किया है।
वस्तुतः इस अध्य्याय में योगेश्वर ने कोई नई बात नहीं बताई है। उन्होंने उन्ही बातों को दुहराया है जो उन्हीं के द्वारा दूसरे से तेरहवें अध्य्याय में अब तक कहीं गई हैं। बार बार समझा कर योगेश्वर याद दिलाना चाहते हैं, कि ईश्वर के प्रति अनन्य भक्ति, अनन्य श्रद्धा ही एक मात्र मार्ग है जिसपर निष्काम भाव से हमें चलना है। राग-द्वेष, मान-अपमान माया मोह, लोभ-लालच से मुक्त, गुणों के प्रभाव से परे होकर ही हम ईश के मार्ग पर चल सकते हैं।
योगेश्वर श्री कृष्ण ने पन्द्रहवें अध्य्याय में पुनः उन्हीं बातों पर दूसरे ढंग से प्रकाश डाला है जिनको वो पहले कह आएं हैं। आत्मा की अमरता, उसके परमात्मा का अंश होने की सत्यता और आत्मा को परमात्मा से मिलाने की भक्तिमयी निष्काम कर्म को ही पुनः दुहराया है। गीता में अध्य्याय छह के बाद बार बार दुहराव है। वो इसलिए है ताकि मानव मात्र निष्काम कर्म के मार्ग को ठीक ठीक समझ सके। वो समझ सके कि किस प्रकार सद्गुरु की सेवा, दैवी गुणों का विकास , इंद्रियों का शमन, मान-अपमान, माया-मोह, लोभ-लालच, क्रोध, अंदुरुनी और वाह्य संकल्पों , जैसी आसुरी अर्थात अवगुणों से मुक्त होकर ब्रह्म से एकाकार होना है, वो समझ सके कि अनन्य भक्ति से इष्ट के प्रति समर्पण ही उसके मुक्ति का मार्ग है।
श्रीमद्भागवत गीता का सोलहवाँ अध्य्याय अत्यंत ही महत्वपूर्ण है, वस्तुतः इस अध्य्याय में श्रीकृष्ण ने जिन दैवी और आसुरी गुणों की व्याख्या की है उनसे स्पष्ट होता है कि निष्काम कर्म के मार्ग पर हमारा आचरण कैसा होना चाहिए।
जब हम काम , क्रोध, मोह, अहंकार, पाखण्ड, घमंड, कठोर वचन जैसे दुर्गुणों को छोड़ कर भयमुक्त, शुद्ध अंतःकरण, इष्ट के प्रति सच्ची लगन, सर्वस्व का समर्पण, मन सहित इंद्रियों का शमन,अहिंसा, सत्य, अक्रोध, विषयों से मुक्त, मान अपमान, सुख दुख में समान भाव रखते हैं तो निश्चित रूप से हम निष्काम कर्म के मार्ग पर बढ़ते हैं। सोलहवें अध्य्याय में श्रीकृष्ण ने इसे विस्तार से समझाया है।
सतरहवें अध्य्याय में श्रीकृष्ण ने गुणों के अनुसार जीवन व्यतीत करने की विशेषताओं का वर्णन किया है जिन्हें सुनकर ही, मनन कर ही समझा जा सकता है।सतरहवें अध्य्याय में श्रीकृष्ण ने गुणों के आधार पर विभिन्न क्रियाओं को बाँटा है जिसका लब्बोलुआब यही है कि मानव मात्र के कल्याण के लिए निष्काम कर्म के पथ पर उस कर्म की समस्त विशेषताओं के साथ ही बढ़ना एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए ताकि जीवन में हम अन्धकार से प्रकाश की तरफ बढ़ सके।
श्रीकृष्ण ने पहले से सतरहवें अध्य्याय में जो शिक्षा दी है उसी को निचोड़ स्वरूप अठारहवें अध्य्याय में पुनः दुहराया है। इस अध्य्याय में योगेश्वर ने बतलाया है कि अपने गुणों के अधीन रहकर मानव किस प्रकार सोचता हुआ विभिन्न क्रियाओं को करता है। उन्होंने पूर्व में कहे अपने कथनों को ही दुहराते हुए गुणोंसे मुक्त हो कर आत्मा के परमात्मा से योग का मार्ग पुनः बतलाया है जो निष्काम कर्म है। इस अध्य्याय में गीता के दर्शन का सारांश है।
श्रीमद्भागवत गीता के अध्यायों की मुख्य विशेषताओं को रेखांकित करते हुए कहना है कि श्रीमद्भागवत गीता का बारम्बार अध्ययन एवं शरण हमें सन्मार्ग पर चलने में मदद देता है। प्रेरित करता है कि हम अपने अंदर की बुराइयों को हराकर अच्छा से अच्छा इंसान बन सकें, अच्छा से अच्छा समाज, देश और काल गढ़ सकें।