सुनना काफी नहीं होता, सुनकर उसे समझना और सुनी हुई बात पर प्रतिक्रिया देना भी जरूरी होता है। सुनने की प्रक्रिया धैर्य के साथ साथ आपकी समझ की परीक्षा भी लेती है। अक्सर सुनने वाला आपकी बात का वही मतलब लिकालता है जो उसकी विचारधारा कहती है। उसे आपकी बात से ज्यादा अपने विचारों से मतलब होता है। वो आपकी बात को घिस रगड़ कर अपनी सोच के अनुसार ढालता है तब उसे समझता है। जैसे यदि आप व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात कीजियेगा तो हो सकता है कि सुनने वाला उसे राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़कर आपकी बात को दूसरा ही मोड़ दे दे। अगर आप सेकुलरिज्म की चर्चा कीजियेगा तो उसे किसी धर्मविशेष के तुष्टिकरण से जोड़ देगा। ठीक इसका उल्टा भी हो सकता है। लेकिन मूल कथ्य ये है कि वो आपकी बात को जस का तस कभी नहीं समझने के लिए तैयार होगा। सुनने की ये त्रासदी संस्थाओं के शीर्ष नेतृत्व में भी है। यदि आप संस्था में सुधार की बात कीजियेगा तो वो इसे वो नेतृत्व को चुनौती की तरह लेगा क्योंकि उसके दिमाग में बैठा हुआ है कि संस्था व्यक्ति की पर्यावाची होती है।
सुनने की अक्षमता का आलम ये है कि बीमारी के इलाज से ज्यादा जोड़ बीमारी का बीमा कराने पर हो चला है। ऐसी स्थिति में जब सुनने की त्रासदी का दौर चल रहा हो तो हर स्तर पर आपको अपनी बात बहुत तफसील से रखने की जरूरत होती है। लेकिन 160 शब्दों के ट्वीटालेखों के जमाने में खुलकर बात कहने और सुनने की फुर्सत किसे रह गई है।