जब हम हिंदुस्तान में गरीबी , रोजगार, शिक्षा, मानवाधिकार, समानता और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर विमर्श करते हैं उस वक्त हम कितनी आसानी से समाज के उस तबके की औरतों और लड़कियों को भूल जाते हैं जो समाज के सबसे निचले तबके की तो हैं हीं, साथ हीं अपने सबसे निचले तबके में भी सबसे निचले पायदान पर होती हैं। स्त्रियों का ये वर्ग हमारी चेतना से ऐसे गायब हो चुका है जैसे उस तबके का इस धरती पर कभी वजूद हीं नहीं रहा है। जब आप इस तबके के बीच जाइयेगा तो वर्ग और जाति की , धर्म और कर्म की, अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र की, विद्वता और ज्ञान की सारी जानकारी से खुद को मरहूम पाइयेगा। हमारे विकास की अवधारणा में ये स्त्रियाँ और लड़कियाँ कोई जगह नहीं बना पाईं हैं आजतक। माध्यम वर्गीय चरित्र उस पीड़ा को शायद ही समझ पाए। कोई भी मॉडल जो मध्यम वर्गीय सोच रखने वाला समाज इस वर्ग को शास्त्रीय अछूत से भी बड़ा अछूत मानकर इनसे किनारा ही कर लेता है खुद को। ऐसी औरतें और लड़कियाँ सिर्फ अवार्ड विनिंग तस्वीरों और फोटोग्राफी के लिए नहीं होती हैं जनाब, इनका अपना एक संघर्ष भी होता है जो आपके ज्ञान की बातों में, बौद्धिक बहस में , समाज की अवधारणा में , अर्थनीति और समाज शास्त्र में , आपकी वैश्विक दृष्टि में , आपके नीति निर्धारक तत्वों में भले ही जगह नहीं पाता हो लेकिन अपनी जिंदगी के जद्दोजहद में इस कदर व्यस्त रहता है कि अपनी परिस्तितियों की असंतुष्टि से संतुष्ट होकर जीना चाहता है। किंतु जीव विज्ञान ने उसे भी वही मस्तिष्क दिया है जो अंततः ये तो समझ ही जाता है कि उसकी बेबस जिंदगी किसी पूर्वजन्म का परिणाम नहीं, बल्कि इसी जीवन की व्यवस्थाओं की देन है। इस तबके को नजरअंदाज तो आप कर सकते हैं, उसे घृणा की वस्तु समझ सकते हैं लेकिन उसकी उपस्थिति आपके विकास के दावे पर हमेशा प्रश्नचिह्न बना रहेगा। जिस दिन ये वर्ग भी अपने जीवन को जीने की बायोलॉजिकल मजबूरी से आजाद पाकर विकास की मुख्यधारा में आएगा उस दिन आपके विकास की परिभाषा को पूर्णता प्राप्त हो पाएगी।
गीता अध्याय 2 श्लोक 47 ----------------------------------- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥ तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो ॥47॥ कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके। श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं। ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं----- 1....