कोविड 19 महामारी को लेकर जो हमारी संस्थागत प्रतिक्रिया रही है वो किसी भी तरह से एक शिक्षित समाज की प्रतिक्रिया नहीं कही जा सकती है। आपको ये आलोचना कुछ अधिक कड़ी लग सकती है लेकिन जब आप अपने सामान्य ज्ञान के आधार पर ही समीक्षा करेंगे तो आप भी इस आलोचना से सहमत हो जाएंगे। जब भी कोई आपदा आती है तो तत्काल उस आपदा से निपटने की बात होती है लेकिन लंबी अवधि के लिए भी कार्य योजना पर मंथन भी शुरू हो जाता है। फिर जैसे जैसे आपदा का जोर कम होता है पुनर्निर्माण का कार्य तो शुरू होता ही है ,साथ ही कमजोर कड़ी को भी दुरुस्त करने की योजना पर भी काम शुरू होता है। ये तथ्य आपदा प्रबंधन के मौलिक योजना का भाग वैश्विक स्तर पर माना जाता है, जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है।
परन्तु कोविड 19 महामारी के दौर में इस दिशा में कोई अगम्भीर चर्चा तक का नहीं होना, संस्थागत विफलता का ही परिणाम है। ये अवसर था कि हम परीक्षण करते कि हमारा पब्लिक हेल्थ सिस्टम महामारी से लड़ने में कितना सक्षम है। संस्थागत स्तर पर खामियों की पड़ताल खुल कर होनी चाहिए थी। असेसमेंट से इवैल्यूएशन तक कि सारी प्रक्रियाओं को लागू करना चाहिए था। ये देखना चाहिए था कि पब्लिक हेल्थ सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए सामुदायिक शिक्षा और जागरूकता के लिए क्या करना होगा, सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों की कमी का क्या कारण है, हमारे हेल्थ सब सेंटर, हेल्थ सेंटर, अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, रेफरल अस्पताल, जिला अस्पताल, और यँहा तक कि उच्च स्वास्थ्य केंद्र भी क्यों चूक गए, पब्लिक हेल्थ सिस्टम के लिए अनिवार्यतः अंतर विभागीय संयोजन में कौन सी कमी रही, क्लीनिकल स्वास्थ्य सेवाएँ महामारी के दौर में बिना पब्लिक हेल्थ सिस्टम के भार वहन नहीं कर सकती जैसे सवालों पर खुलकर विमर्श की आवश्यकता थी। जरूरत थी आँकड़ों को जस के तस स्वीकार करने की। लेकिन न तो सरकारी स्वास्थ्य महकमे से, न हीं राजनीतिक महकमे से, न ही पब्लिक हेल्थ के दिग्गज प्रतिनिधियीं के द्वारा ही इस तथ्य को रेखांकित किया जा रहा है।
कोविड 19 महामारी ने जिस तरह से वैश्विक स्तर पर जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है, उनकी स्थापित दिशा को मोड़ दिया है वैसी स्थिति में कोविड 19 के प्रभावों के अध्ययन-समीक्षा के लिए मल्टी डिसिप्लिनरी स्पेशलिस्ट्स का अन्वेषण समूह बनाया जाना चाहिए था और इसके लिए वैश्विक संगठनों यथा WHO, UNDP, UNICEF, JHONS HOPKINS UNIVERSITY, और अन्य वैश्विक सर्वेक्षण-अध्ययन संस्थानों और विश्वविद्यालयों की मदद भी ली जा सकती थी। इतना तो तय है कि कोविड 19 की बीमारी भले ही भविष्य में नियंत्रण में आ जाये पर जीवन का हर विषय अब परिवर्तित होगा और इसकी तैयारी यदि अभी से नहीं की जाएगी तो भविष्य में राष्ट्रीय स्वास्थ्य एक ऐसे पिछड़े सेक्टर के रूप में अपनी जड़ें जमा लेगा कि आप एक बीमार समाज के सदस्य बने रहने की जोखिम में जी रहें होंगे। यदि वैश्विक स्तर पर हमें कदम ताल मिला कर चलना है तो वैश्विक स्तर पर इस दिशा में हो रहे बौद्धिक प्रयासों का हिस्सा बनने की कोशिश करनी चाहिए।