#sociologyofcorona
कोरोना के अन्य पहलू
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नॉवेल कोरोना वायरस और इससे जनित बीमारी COVID19 से बचाव और इलाज के बारे में बहुत कुछ लिखा कहा जा रहा है। इसके आर्थिक पक्ष की भी चर्चा हो रही है और उन राजनेताओं की भी खूब आलोचना हो रही है जिन्होंने शुरुआत में इस बीमारी को हल्के में लिया जिसके कारण उनका सुखी सम्पन्न देश आज कोरोना की मार से कराह रहा है। लेकिन इन सब के बीचएक चीज ऐसा भी है जिसकी भारी कीमत हमें पोस्टकोरोंना फेज में चुकानी पड़ सकती है वो है इस बीमारी के सामाजिक परिणाम। पिछली बीमारी जिसके व्यापक सामाजिक परिणाम हुए थे वो एड्स था, लेकिन एड्स की व्यपकता इतनी कभी नहीं थी और न ही हो पाएगी सो इसके सामाजिक परिणाम भी सीमित ही रहे।
वैसे तो किसी भी मृत्यु के चाहे वो जिस कारण से होते हों उनके सामाजिक परिणाम होते हीं हैं और कोरोना के मामले में भी ऐसे ही परिणाम आते हैं। लेकिन कोरोना के कारण एक अलग तरह की सामाजिक समस्या उत्पन्न होने लगी है। एक ही समाज, एक ही परिवार, एक ही सोसाइटी, एक ही मोहल्ले, एक ही शहर/गाँव में अपनों से भौतिक और सामाजिक दूरी एवं यातायात पर प्रतिबंध इस बीमारी के फैलाव को कम करने और इसके असर को नियंत्रित करने के लिए अनिवार्य शर्त हैं । इस दूरी के सामाजिक परिणाम विशेषकर बीमारों, स्त्रियों, गर्भवती माताओं, वरिष्ठ एवम वृद्ध नागरिकों, एकल नागरिकों, एकल परिवारों, विद्यार्थियों , मजदूरों आदि के लिए बहुत ही विकट हैं।
ये स्थिति कमोबेश वही है जो एक बहुव्यापी युद्ध के समय होता है।इसलिए आवश्यक है कि हम इस सामाजिक समस्या पर चर्चा करें ताकि बीमारी से लड़ने और उसे नियंत्रित करने के कठोरतम उपायों को करने के साथ साथ अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भी निर्वहन कर सकें। विभिन्न सरकारों, केंद्र एवम राज्य सरकारों के द्वारा इस दिशा में कदम भी उठाए जा रहें हैं। केंद्र सरकार के अतिरिक्त केरल, दिल्ली, पंजाब, उत्तरप्रदेश, बिहार आदि राज्यों की राज सरकारों के द्वारा अलग अलग आर्थिक पैकेजों की घोषणा की गई हैं। लेकिन समस्या के सामाजिक-मनोवैज्ञानिक पक्ष अभी भी अछूते हीं हैं जिनपर शीघ्रताशीघ्र काम करने की आवश्यकता है। आज की तारीख में शासन-प्रशासन का दायित्व स्वास्थ्य व्यवस्था, विधि व्यवस्था, अर्थव्यस्था से आगे जाकर सामाजिक व्यवस्था एवं मनोवैज्ञानिक व्यवस्था को भी सम्भालने की हो चुकी है। शासन के प्रत्येक अंग को इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए अपनी भूमिका को पुर्नपरिभाषित करना आवश्यक है।
(इस लेख को आगे बढाने के पूर्व मैं आप सभी के विचारों को आमंत्रित कर रहा हूँ। आप चाहें तो कमेन्ट बॉक्स में अपने विचारों को रख सकते हैं)।