#sociologyofcorona
जिंदगी ठहरी जरूर है, पर खत्म तो नहीं हुई है न? इस ठहरी हुई जिंदगी में जिंदा बने रहने की जो हलचल है, जो जुनून है, वही जुनून जिंदगी को फिर से गति भी देगी और कोरोना को मात भी देगी। इस ठहरी हुई जिंदगी में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जो इंसान को उसकी इंसानियत पर भरोसा भी दिला रहा है और ये भी बता रहा है कि इंसानियत की ताकत, उसके जज़्बात इतने गहरे हैं कि वो इंसान और इंसानियत के किसी भी दुश्मन को हरा सकते हैं, भले ये लड़ाई थोड़ी लम्बी ही क्यों न चले।
साथ ही इस ठहरी हुई जिंदगी ने एक मौका भी दिया है कि इंसान ठहर कर परख सके कि वो सभ्यता की सदियों को पार कर आखिर पहुँचा कँहा है? मानव सभ्यता का इतिहास जँहा एक तरफ रूहानी और आध्यात्मिक उपलब्धियों से भाड़ा पड़ा है, वंही चमत्कारिक वैज्ञानिक और तकनीकी उपब्धियों का असीमित खजाना भी है इसके पास। लेकिन जो बात सालती है वो है इंसानी सभ्यता की तारीख में बड़े नरसंहारों वाली लड़ाइयाँ जो इंसान के इलाको पर कब्जा करने की कबीलाई लालच के परिणाम ही रहें हैं। इंसान समस्त धरती को (या कहें तीनों लोकों पर) कब्जे को लेकर इतना लालायित रहा है कि उसने धर्म, अध्यात्म, विज्ञान और तकनीक सभी का मुँह उधर ही मोड़ दिया है, इंसान ने अपनी हर खूबी का इस्तेमाल, अपनी हर उपलब्धि का इस्तेमाल इलाकों पर कब्जा करने के लिए किया, उन इलाकों के इंसानों पर अपने प्रभुत्व को कायम करने के लिए किया, फिर चाहे ये प्रीहिस्ट्री का दौर रहा हो या फिर आज का। नतीजा? नतीजा यही निकला कि इंसान ने अपने सारे संसाधन, सारे ज्ञान-विज्ञान और धर्म को इसी एक काम में लगा दिया और भूल गया कि उसकी सारी उप्लब्धधियाँ तभी तक मायने रखती हैं जब तक इंसान की प्रजाति इस धरती पर है। यदि हम विज्ञान की नजर से ही देखें तो अबतक पाँच ग्रेट एक्सटिंक्शन हो चुके हैं, एक से एक शक्तिशाली प्राणी विलुप्त हो चुके हैं। विज्ञान के अनुसार ही मानव अबतक का सबसे बुद्धिमान प्राणी है, लेकिन यदि इंसान ही इंसान को मारने की विधि और यंत्र बनाता फिरे तो फिर वो बुद्धिमान कैसे? बुद्धिमानी विनाश में नहीं, सृजन में होती है। और आज जब एक अदृश्य वायरस ने दुनिया को रोक दिया है, जिंदगी को ठहरा दिया है तो इस मौके को तराशते हुए ये सोचने और समझने की जरूरत है कि हमारी उपब्धियाँ अभी भी कितनी छोटी हैं। कँहा तो हमें इंसान के दुश्मन से लड़ने का ज्ञान अर्जित करना था और कँहा हमारी दुनिया के लोग एक दूसरे से ही लड़ने के यंत्र बनाने में लगे थे।
तो आइए , मानव जाति से यही अपेक्षा है कि अतीत की भूलों से सबक लेकर सारे अध्यात्म, धर्म, ज्ञान,विज्ञान और तकनीक का विकास हम सब मानव मात्र के कल्याण के लिए करें। निश्चित ही जिंदगी फिर चलेगी, मौज से चलेगी, हँसती, खिलखिलाती चलेगी।