भारतीय लोकतंत्र और निरंकुशता
लेकिन क्या वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की चुनाव व्यवस्था निष्पक्ष और साफ सुथरी है? यह सवाल आज और समीचीन हो गया है जब से हमने ये जाना है कि भारत का चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के दबाव में काम कर रहा है। यह बात इस रस्योद्घाटन से भी जड़ जमाई है कि एक तत्कालीन चुनाव आयुक्त की जासूसी पेगासस सॉफ्टवेयर के माध्यम से कराई गई। लेकिन एक सवाल है कि क्या भारतीय चुनाव प्रणाली को इस सरकार ने ही पहली बार प्रदूषित किया है या यह एक लंबी प्रक्रिया का छोटा सा भाग भर है? क्या आज के विपक्षी दल जो कल सत्ता में थे उन्होंने ऐसा कोई घृणित कार्य नहीं किया था? भारतीय चुनाव व्यवस्था में भयंकर हिंसा, बाहुबल, और पैसे का बोलबाला क्या 1951 के पहले चुनाव से ही नहीं शुरू हो गया था? आज जो दल वर्तमान सरकार की करतूतों को गिना रहें हैं वे ही दल जब कल सत्ता में थे तो उन्होंने हिंसा, बाहुबल और पैसा का खूब खेल खेला और चुनाव व्यवस्था को प्रदूषित करने में कोई कोर कसर नही छोड़ा। वर्तमान सरकार वस्तुतः उसी परम्परा को बदले हुए आर्थिक और तकनीकी परिदृश्य में आगे बढ़ा रही है।
इन सभी दलों ने मिलकर विशेषकर 1967 से जिस तरह से चुनाव व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास अपने अपने तरीके से किया है उसकी मिसाल तुर्की, हंगरी, और अफ्रीकी लोकतंत्रों में ही मिल सकती है। इन सब के बीच चुनाव व्यवस्था के केंद्र में रहने वाला एक आम वोटर, एक व्यक्ति-एक वोट की समानता के दिवास्वप्न में अपने लोकतंत्र को चुनाव दर चुनाव गँवाते गया है।
हम ये भी देखते हैं कि लोकतंत्र के मौलिक सिद्धान्तों के विपरीत भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया काम करती है। लोकतंत्र का मतलब होता है लोगों की इक्षा के अनुसार शासन चलाना। शासन-प्रशासन चलाने का जिम्मा जिनको दिया जाता है उनमें चयनित नियमित नौकरशाही और राजनीतिक कार्यपालिका दोनों शामिल होते हैं लेकिन शासन पर जनता का नियंत्रण निर्वाचित प्रतिनिधियों के सदन के माध्यम से होता है। लेकिन भारतीय राज व्यवस्था की संरचना इस तरह की बनी है जिसमें जनता को प्रतिनिधित्व देने वाली पार्टियों के लिए आंतरिक लोकतंत्र के पालन की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है और इस प्रकार प्रत्येक दल अपनी संरचना में हीं निरंकुश है। दूसरी तरफ बहुमत आधारित शासन व्यवस्था में हर तरह के अनैतिक और अलोकतांत्रिक तरीके से बहुमत के जुगाड़ की व्यवस्था है। तीसरी बात कि निरंकुश दल से बनी निरंकुश कार्यपालिका आसानी से निर्वाचित बहुमत के बल पर विधायिका का अपहरण कर लेने के लिए स्वतंत्र है। विधायिका अपने दैनिक काम काज के लिए भी कार्यपालिका के निर्णयों पर आश्रित है। यँहा तक कि विधायिका अपनी बैठकों, उन बैठकों में एजेंडा निर्धारण और अपने काम काज के निपटारे के नियमों और नियमनों के लिए भी कार्यपालिका पर निर्भर है।
ऐसी स्थिति में एक भ्रष्ट चुनाव व्यवस्था से बनी विधायिका और उससे निकली निरंकुश कार्यपालिका से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद पालना भी बेवकूफी के सिवाय और कुछ नहीं है। दरअसल भारतीय लोकतंत्र अपने जड़ से ही निरंकुशता को लेकर निकली है जिससे लड़ाई लड़ने के लिए एक ही हथियार बचता है जो हमारा संविधान है और एक ही मार्ग है जो संविधानवाद का है।