श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 7
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ
॥7॥
हमने अभी देखा समझा कि ईश्वर सर्वव्यापी है, प्रत्येक दृश्य और अदृश्य में ईश्वर है, से सभी ईश्वर के ही विभिन्न अभिव्यक्ति मात्र हैं। इसी को विस्तार देते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि कब कब ईश्वर की अनुभूति प्रत्यक्ष होती है। ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति को ही अवतार का होना कहते हैं।
समाज की सुचारू संरचना के लिए आवश्यक है कि समाज में यज्ञ भावना हो, अर्थात ये भावना हो कि "एक सब के लिए है और सब एक लिए है" (ONE FOR ALL AND ALL FOR ONE).। प्रकृति के नियमों के संचालन में बाधा नहीं डाली जाती है और मनुष्य का निजी और सामाजिक विवेक सभी मनुष्यों के उत्तरोत्तर उत्थान के लिए उपयोग में लाया जाता है तो वह अवस्था धर्म के उत्थान की अवस्था होती है जिसमें समाज और व्यक्ति की भौतिक और आध्यात्मिक उत्पादकता श्रेष्ठ स्थिति में होती है। अगर ऐसा नहीं होता होता है तो उस पतन को ही अधर्म का बढ़ना कहते हैं। जब ऐसा होता है तो व्यक्ति और समाज दोनों के अंदर आसुरी प्रवृत्तयाँ जैसे असत्य, हिंसा, क्रोध, लोभ, घृणा जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगती हैं जिसके कारण समाज में अनाचार, अत्याचार बढ़ते हैं और प्रकृति के नियम बाधित होते हैं। समाज का हर अंग इसके प्रभाव में आ जाता है। इसकी अभिव्यक्ति भौतिक से लेकर आध्यात्मिक क्षेत्र में उत्पादकता की पतनशीलता से परिलक्षित होती है। अधर्म की इस स्थिति में समाज के भीतर एक बेचैनी जन्म लेती है जो ईश्वरीय अभिव्यक्ति की आकांक्षी होती है। इस आकांक्षा से ईश्वर की अनुभूति प्रत्यक्ष होती है जिसे हम ईश्वर के प्रत्यक्ष अवतरण के रूप में लेते हैं। ईश्वर की यही प्रत्यक्ष अनुभूति ईश्वर का अवतार है । जिसके अंदर इस अनुभूति का संचार नहीं होता उसे ईश्वर के अवतार का भान तक नहीं होता है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण को अवतार के रूप में पूजते हैं ।लेकिन कौन पूजता है? वही जिनके अंदर धर्म की हानि से बेचैनी होती है जैसे पाण्डव। दुर्योधन इस पतन का वाहक है तो उसके लिए श्रीकृष्ण ग्वाला मात्र हैं जिनको बेड़ियों में बाँधना चाहता है वह। इसी प्रकार शिशुपाल के लिए भी श्रीकृष्ण एक नीच कुल में जनमें धूर्त ग्वाला मात्र हैं। सो व्यक्ति को जब अधर्म की वृद्धि पर बेचैनी होती है तो ईश्वरीय अनुभूति प्रत्यक्ष सामने आकर व्यक्ति का मार्गदर्शन करने लगती है तो उसे अपना वह मार्गदर्शक अवतार पुरुष प्रतीत होता है। वस्तुतः प्रकृति के नियम जब कभी , जँहा कँही अत्यधिक असन्तुलित कर दिए जाते हैं वंही उसका आंतरिक विवेक एक स्वरूप लेकर उसे ठीक करने के लिए क्रियाशील हो उठता है जो ईश्वरीय अवतरण का ही स्वरूप है। ईश्वर तो अजन्मा और अविनाशी है तो फिर जिसकी श्रद्धा धर्म के प्रति है उसके लिए ईश्वर का अवतार तो निरन्तर उसी के साथ है।